भास्कर विशेष. अनेक मनोविकारों पर विजय प्राप्ति के लिए दशहरा शुभ दिन है। इसी वजह से कई क्षेत्रों में विजयादशमी को अबूझ मुहूर्त भी मान लिया गया है। उन्नति की कामना करने वालों को इस दिन इच्छित कार्य का प्रारंभ करना चाहिए। इस समय प्रारंभ किया गया कार्य सिद्धि को देने वाला होता है।
विजयादशमी आत्मबल की प्राप्ति का पर्व है और जिसमें आत्मबल होता है वह अवश्य ही विजयी होता है। आत्मबल के लिए शक्तिसंचय जरूरी है और उपासना एवं शारीरिक दृष्टि से पुष्ट होने के लिए शरद ऋतु महत्वपूर्ण होती है, साथ ही अगस्त्य तारे का उदय होना श्रेष्ठ माना जाता है। रावण से भीषण युद्ध करते हुए राम जब थक गए और रावण का सिर कटते ही नया सिर आ जाता था, तब वह भी घबरा गए थे। ऐसी स्थिति में मुनि अगस्त्य ने राम को आदित्यहृदयस्तोत्र का पाठ करने की सलाह दी, जिससे राम को ब्रrास्त्र के प्रयोग का बोध हुआ। कुछ कथाओं में विभीषण द्वारा रावण की नाभि में अमृत का रहस्य बताने का भी उल्लेख है।
ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से भी आश्विन शुक्ल दशमी को अगस्त्य तारे का उदय हो जाता है। आत्मबल का प्रतीक आत्म कारक सूर्य दक्षिण गोल में प्रवेश करता है। दक्षिण गोल राक्षसों का क्षेत्र माना गया है तथा उत्तर गोल देवों का क्षेत्र माना जाता है। राम आत्मा का पर्याय हैं और सूर्य ही आत्मस्वरूप होता है।
दक्षिण गोल में सूर्य के जाने पर राक्षसक्षेत्र प्रभावी होता है, जो मन के करीब है और मन ही सारे विकारों का घर है। पांच ज्ञानेंद्रियों एवं पांच कर्मेद्रियों का राजा मन ही है। दस इंद्रियों के विकार ही दुराचार, अभिमान, लोभ, मोह आदि पैदा करते हैं। इससे व्यक्ति, परिवार एवं राष्ट्र अशांति, अस्थिरता एवं विनाश की ओर अग्रसर हो जाते हैं। सूर्य की आराधना या सूर्य प्रबल होने पर आत्मबल प्राप्त होता है जिससे दस इंद्रियों के विकारों पर विजय प्राप्त हो जाती है। राम-रावण की कथा एवं विजयादशमी भी इसी का संदेश देती है कि दशानन रूपी आसुरी शक्तियों पर दैवीय शक्तियों की विजय होती है।
वस्तुत: रावण का अर्थ रुलाने वाला है और मोह, मद आदि मनोविकार ही दुख (रुलाने) का मूल कारण हैं। रावण के दस मुख काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईष्र्या, द्वेष, छल, हठ और आलस्य हैं, जिनके वशीभूत होकर इंद्रियां सम्मोहित होकर अपने परम लक्ष्य को भूल जाती हैं। नवरात्र में शक्ति उपासना से आत्मशक्ति का संचय करके ही इन आसुरी शक्तियों से लड़ना संभव होता है।
ज्योतिषशास्त्र में मनोविकार के कारक शनि एवं चंद्रमा माने गए हैं। वैसे तो सभी ग्रह आंशिक रूप से अलग-अलग परिस्थितियों में मनोविकार के कारक बनते हैं, लेकिन जिनका सूर्य बलवान होता है वे मनोरोगी नहीं हो पाते हैं और इसीलिए विजयादशमी को शमीवृक्ष जिसे खेजड़ी या जाटी भी कहते हैं, की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व धर्मशास्त्रों में बताया गया है। पौराणिक कथा के आधार पर शमीवृक्ष में लक्ष्मी का वास माना गया है। आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को भगवान विष्णु का आगमन माना गया है और इसीलिए धर्मशास्त्र में विजयादशमी को गांव, नगर के बाहर स्थित शमी वृक्ष की पूजा एवं अनुष्ठान का विधान है। कहा गया है:-
आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
स कालो विजयो ज्ञेय: सर्वकार्यार्थसिद्धये।।
खेजड़ी की जड़ की मिट्टी को भी ससम्मान घर लाकर रखनी चाहिए। कहा गया है:-
गृहीत्वा साक्षतामाद्र्रा शमीमूलगतां मृदम्।
गीतवादित्रनिघरेषैस्ततो देवं गृहं नयेत्।।
इस दिन अपराजिता का श्रद्धापूर्वक पूजन कर दुगरुणों से अपराजेय रहने की कामना करते हैं। हम दृढ़ता और तेज की कामना से शमी पूजन करते हैं ताकि हमें दुगरुणों से लड़ने की दृढ़ता एवं उन्हें पराजित करने का तेज उत्पन्न हो सके।
भगवान श्रीराम ने श्रवण नक्षत्र युक्त दशमी को रावण विजय के लिए प्रस्थान किया और शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी, इसीलिए ज्योतिषशास्त्र में फल प्राप्ति के लिए पूर्णा तिथि में अनुष्ठान करना श्रेष्ठ कहा गया है। विशेषकर आश्विन शुक्ल दशमी को:-
या पूर्णा नवमी युक्ता तस्यां पूज्यापराजिता।
क्षेमरथ विजयरथ च पूर्वोक्तविधिना नरै:।।
उन्नति की कामना करने वालों को इस दिन इच्छित कार्य का प्रारंभ करना चाहिए। अत: जिन लोगों को शत्रु पीड़ा हो या जिनके कार्य निष्फल होते हों उन्हें विजयादशमी के दिन अपराजिता का पूजन कर कार्य शुरू करना चाहिए। इस समय प्रारंभ किया गया कार्य सिद्धि को देने वाला होता है। जैसा कि धर्मशास्त्र में भी विधान किया है :-
श्रवणक्र्षे तु पूर्णायां काकुत्स्थ: प्रस्थितो यत:।
उल्लंघयेयु: सीमानं तद्दिनक्र्षे ततो नरा:।।
आजकल विजयादशमी को रावण जलाने तक ही सीमित कर दिया है। जबकि यह अति महत्वपूर्ण दिन है। आश्विन मास में शमीपूजा चंद्र शनिजन्य दोष शांत करती है तथा शुभ लक्ष्मी की प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त करती है। इससे व्यक्ति में आत्मबल बढ़ता है और मानसिक विकार समाप्त होते हैं। अनेक मनोविकारों पर विजय प्राप्ति का भी यह शुभ दिन है। इसीलिए कई क्षेत्रों में विजयादशमी को अबूझ मुहूर्त भी मान लिया गया है। मुहूर्त ग्रंथों में यद्यपि यह स्वीकार्य नहीं है। विजयादशमी को अगस्त्य तारे का दर्शन शुभ माना जाता है। दक्षिण-पूर्वी क्षितिज पर उगने वाला यह तारा अगस्त्य ऋषि का स्वरूप माना जाता है, जिन्होंने श्रीराम को विजय प्राप्ति हेतु योग बताया था। इस दिन श्रद्धापूर्वक अपराजिता का पूजन कर दुगरुणों से अपराजेय रहने की कामना की जाती है।
सार्थक बनाएं जीवन
विजयादशमी भारतीय संस्कृति का मुख्य पर्व है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विजयादशमी को ऐसे ग्रह-नक्षत्रों का संयोग होता है, जिसमें विजय यात्रा की शुरुआत करने पर विजय की कामना रखने वालों की निश्चय ही जीत होती है। भगवान राम की रावण पर विजय दैवीय एवं मानवीय गुणों - सत्य, नैतिकता तथा सदाचार की राक्षसी एवं अमानवीय दुर्गुणों - अनैतिकता, असत्य, दंभ, अहंकार और दुराचार पर विजय है। यह पर्व न्याय की जीत और नारी जाति के अपमानकर्ताओं के संहारका प्रतीक है। इस तिथि की विजय यात्रा केवल लंका या रावण पर राजनैतिक विजय नहीं है, बल्कि सनातनधर्म और मानवीय मूल्यों की संरक्षणात्मक पद्धति का शिलान्यास है।
भगवान राम की विजय यात्रा के स्मरण में मनाए जाने वाला विजयादशमी का पर्व आज त्रेतायुग से भी ज्यादा प्रासंगिक है। आज जाने-अनजाने प्रतिदिन कितनी ही सीताएं अग्नि की भेंट चढ़ रही हैं। विजयादशमी पर मात्र रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने और खुशियां मनाने भर से इस पर्व की शिक्षा की सार्थकता नहीं रह जाएगी, बल्कि इतिहास से प्रेरणा लेकर हमें अन्याय, गरीबी, अशिक्षा, अनैतिकता, चोरी, लूट, शोषण, हिंसा, रावण-कुम्भकर्ण-मेघनाद रूपी आतंकवाद को नष्ट करना होगा।
समाज से भय निकालना होगा। देशभक्ति की भावना को जाग्रत करना पड़ेगा। पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण और दीवानगी ने हमारी सामाजिक और सनातनधर्म की व्यवस्था को चौपट कर दिया है। आज के परिप्रेक्ष्य में विजयादशमी का पर्व और भी अधिक प्रासंगिक है। आज हमें किसी और रावण को मारने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हम अपने स्वयं में विद्यमान लालच, छल-कपट, अनैतिकता, असत्य, दम्भ, अहंकार, दुराचार, लोभ, हृदयहीनता, मोह, द्रोह, मद और निर्दयता को हमेशा-हमेशा के लिए त्याग दें। स्वयं अपने पर विजय प्राप्त करें।