निर्देशक-नायिका प्रेम प्रसंग
जयप्रकाश चौकसे Tuesday, September 29, 2009 00:22 [IST]  

Rani Mukherjeeफिल्मकार और नायिका के बीच प्रेम होना सिनेमा के प्रारंभिक दौर से ही जारी है। चंदूलाल शाह और गौहरबाई से लेकर आदित्य चोपड़ा और रानी मुखर्जी तक यह सिलसिला चल रहा है। सिनेमा के पहले रंगमंच में भी अनेक प्रेम प्रसंग हुए हैं। शायद कला के सभी क्षेत्रों में यह होता आया है कि प्रेम कहानी रचते-रचते प्रेम हो जाता है। सृजन का क्षेत्र प्रेम की ऊर्जा से ही संचालित होता है।

सिनेमा की निर्माण प्रक्रिया ही कुछ ऐसी है कि इससे जुड़े लोग लंबे समय तक घर से दूर रहते हैं और काम का समय दफ्तरनुमा 9 से 5 नहीं है। फिल्मकार नायिका को उसके सुंदरतम रूप में प्रस्तुत करना चाहता है और नायिका आत्ममुग्धा की तरह अपनी इस छवि से प्रभावित होते हुए फिल्मकार को चाहने लगती है। उसे लंबे समय तक समझ में नहीं आता कि वह फिल्मकार की योग्यता या क्राफ्ट से प्रेम करने लगी है और क्राफ्ट से कोसों दूर खड़ा है व्यक्ति।

सृजनशील व्यक्ति बहुत उलझा हुआ आदमी होता है। प्याज की तरह सारे छिलके उतारने पर हाथ में कुछ नहीं आता, रह जाती है प्याज की गंध और वही असल माल है। छोटे फिल्मकार केवल स्वयं से प्यार करते हैं। प्राय: अहंकार के कारण वे नहीं चाहते कि नायिका का इश्क कहीं और हो जाए। नायिकाएं भी एक से जुड़कर स्वयं को सुरक्षित महसूस करने लगती हैं। कुछ निर्देशक-नायिका प्रेम ने महान फिल्मों को जन्म दिया और कुछ ने घटिया फिल्मों को। क्या काम की गुणवत्ता प्रेम की गहराई या खोखलेपन को इंगित करती है?

शांतारामजी ने संध्या को पहली बार प्रस्तुत किया। वह बहुत सांवली साधारण सी कन्या थीं, परंतु अंग तोड़ देने वाले नृत्य में घोर परिश्रम करती थीं। वह नृत्य के साथ सर्कस के करतब थे। यह शांतारामजी का ही कमाल था कि महिपाल और गोपीकृष्ण जैसे अत्यंत साधारण कलाकारों को लेकर उन्होंने संध्या के साथ ‘नवरंग’ और ‘झनक झनक पायल बाजे’ जैसी सफलताएं रचीं। दरअसल शांतारामजी का स्वभाव वैदिक काल के गुरुओं की तरह था। अनुशासित शिष्य गुरु की निजी संपत्ति होता था। संध्या हड्डी टूटने के बाद भी नाची हैं। संध्या के मन में प्रेम नहीं श्रद्धा थी और शांतारामजी का गुरु दंभ संतुष्ट होता था।

वहीदा रहमान का मन भी संध्या के रेशे से बुना हुआ लगता है। उनके मन में गुरुदत्त के लिए अपार श्रद्धा थी। ‘प्यासा’ के पहले दौर के रशप्रिंट में वह इतनी खराब नजर आईं कि पूरी यूनिट नायिका बदलना चाहती थी, परंतु गुरुदत्त ने वहीदा के साथ वे सारे दृश्य दोबारा शूट किए। गुरुदत्त सांस्कृतिक शून्य से शिथिल पल-दो-पल वहीदा के सानिध्य में सांस लेने आते थे। यह पूरी तरह प्लेटोनिक प्रेम कथा थी।

राज कपूर-नरगिस प्रेमकथा में सृजन की भागीदारी का आधार था। यह नरगिस का कमाल था कि उनके सानिध्य में पुरुष अपना श्रेष्ठतम देता था। मेहबूब खान की श्रेष्ठ फिल्में ‘अंदाज’ और ‘मदर इंडिया’ तथा राज कपूर की ‘आग’ से ‘जागते रहो’ तक तथा सुनील दत्त की ‘मुझे जीने दो’ और ‘रेशमा और शेरा’ तक नरगिस का कमाल था। राज-नरगिस के प्रेम प्रकरण में नरगिस की तरफ से पूरा समर्पण था, परंतु विवाहित राज कपूर दुविधाग्रस्त थे। नरगिस को ताउम्र महज प्रेमिका बने रहना गवारा न था। वह मां बनना चाहती थीं।

राज कपूर नायक प्रधान फिल्में रचते थे और नायिका प्रधान ‘अजंता’ लंबे समय तक कागज पर ही रही। जैसे ही नरगिस ने महसूस किया कि वह सृजन में बराबरी की भागीदार नहीं हैं, वैसे ही उन्होंने विकल्प खोजना शुरू किया। राज कपूर के सहायक लेख टंडन ने ‘अजंता’ को ही वैजयंती माला के साथ ‘आम्रपाली’ के नाम से बनाया और अपने गुरु की तरह नायिका को अभिनव छवि देते-देते प्यार कर बैठे और उसी नशे में असफल फिल्म बना बैठे। चेतन आनंद का प्रिया राजवंश से प्रेम हुआ और इस कारण बार-बार उन्हें ही नायिका लेने की जिद ने उनकी अपार प्रतिभा को लील लिया। नायिका से इश्क में प्राय: फिल्मकार तबाह हुए हैं।

 
 


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