आज से ढाई सदी पहले नेपाल को एक सूत्र में बांधने वाले पृथ्वी नारायण शाह के पहले के पहाड़ी सिद्धांत मुगलन या यूं कहें कि मुगलों के मैदानी इलाकों से भिन्न थे। खासतौर से काठमांडू की घाटी के छोटे-छोटे धनाढ्य राज्यों में दक्षिण के ताकतवर राजाओं और नवाबों के प्रति काफी विरोध और शत्रुता की भावना रही है। पाटन में प्रचलित एक मिथकीय कथा बताती है कि गैभाज्य नाम के एक स्थानीय तांत्रिक ने एक मुगल तांत्रिक पर विजय हासिल की थी। बीसवीं शताब्दी के मध्य में जब नेपाल में आधुनिक युग का पदार्पण हुआ तो राजा महेंद्र ने इस ऐतिहासिक विदेशी भय को और ज्यादा हवा दी, ताकि वह अपनी सत्ता की पकड़ को और मजबूत कर सकें। आधुनिक भारत की बढ़ती हुई शक्ति के साथ नेपाल का ऐतिहासिक उग्र राष्ट्रवाद भारत विरोध में तब्दील हो गया। विश्वेश्वर प्रसाद कोईराला के नेतृत्व वाले जिन लोकतंत्रवादियों का पतन हुआ, उन्हें नेपाल में अराष्ट्रीय तत्व माना जाता था, जिसका एक आशय यह भी था कि वे लोकतंत्रवादी भारत के चाकर थे। पंचायत युग की दो पीढ़ियां इस भारत विरोध के साथ बड़ी हुईं। यहां तक कि जो लोग काठमांडू में सत्ता में थे, वे भी जानते थे कि उनके पास इसके सिवा कोई रास्ता नहीं है कि वे चुपचाप दिल्ली दरबार के सामने अनुनय-विनय करें। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने अपने लिए व्यापक जनसमर्थन जुटाने के लिए महेंद्र के उग्रराष्ट्रवाद को एक प्लेटफॉर्म के रूप में अपनाया। पशुपतिनाथ मंदिर वाला प्रकरण साफतौर पर गहरे पैठे हुए उस उग्र राष्ट्रवाद का नतीजा है, जिसे नेपाल के समूचे इतिहास की अपनी एकांगी समझ से माओवादी संगठनों ने और मजबूत किया है। लेकिन इसी के साथ-साथ माओवादी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से तो भारत विरोधी है और भीतर-ही-भीतर नई दिल्ली की खुशामद भी करता है। बागमती नदी के तट पर प्राचीन काठमांडू के एक दूरस्थ इलाके में पशुओं के देवता को समर्पित एक पीठ और शक्ति के एक केंद्र के रूप में पशुपतिनाथ मंदिर की उत्पत्ति कैसे हुई, इसकी जड़ें प्रागैतिहासिक युग में हैं। जैसे-जैसे यह मंदिर शिव मंदिर के रूप में विकसित हुआ, लिच्छवी काल से लेकर सोलहवीं सदी तक इस मंदिर में पूजा करने के लिए मैदानी इलाकों से संन्यासियों को बुलाया जाता रहा। सत्रहवीं सदी के मध्य में विंध्य के दक्षिण से मूलभट्ट या महंतों को बुलाने की परंपरा प्रारंभ हुई। यह परंपरा आज तक चली आ रही है। बहुत रोचक है कि इस परंपरा का ही प्रतिबिंब था कि आज हजारों की संख्या में नेपाली मूल के पुजारी भारत के अनेक शक्तिपीठों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। मंदिर के महंत को सुदूर इलाकों से बुलवाने के पीछे यह कारण था कि मंदिर प्रबंधन को स्थानीयकरण से मुक्त रखा जा सके। इसने रस्म-रिवाज के प्रदूषण से देवताओं की रक्षा की और स्थानीय राजनीति की खींचतान को दूर रखा। सुदूर विंध्य के दक्षिण से भट्टों को बुलाने की व्यवस्था इसलिए भी बनी क्योंकि काठमांडू की आदर्शवादी पवित्रता का यह विश्वास था कि उत्तरी इलाकों के पंडित नास्तिकता के प्रभाव में दूषित हो चुके हैं। संभव है, कुछ लोगों को लगा हो कि नास्तिक माओवादियों ने धर्म के मामलों का परित्याग कर दिया होगा। लेकिन धर्म के प्रति उनका निरादर का भाव एक नए आधुनिक किस्म के उग्रराष्ट्रवाद से जुड़ गया। पशुपतिनाथ मंदिर पर यह विवाद तो होना ही था और चूंकि पिछले वर्ष माओवादी सत्ता का नेतृत्व कर रहे थे, तो उनके लिए यह बहुत छोटा-सा कदम था कि वे पशुपतिनाथ मंदिर के महंत के चयन की प्रक्रिया में व्यवधान पैदा कर दें। उनके लिए राष्ट्रवाद की राजाज्ञा की यह आवश्यकता थी कि दो ‘भारतीय’ पुजारियों को हटा दिया जाए और उनके स्थान पर ऐसे ब्राrाणों को नियुक्त किया जाए, जो नेपाल के नागरिक हों। जाहिर है कि उन लोगों ने नेपाल के भीतर शिव में आस्था रखने वालों के बीच और उसके बाहर एक वृहद हिंदू समुदाय के बीच जिस तरह की अशांति और व्याकुलता पैदा की है, माओवादी नेता उसे पसंद नहीं करेंगे। माओवादी एक ऐसे काम को आगे बढ़ाने के बजाय, जिसके कारण क्रांति के बाद लोगों को बदलने और अपनी पकड़ मजबूत बनाने में दिक्कत होती, उन्होंने भौगोलिक-धार्मिक राजनीति की कड़ाही में हाथ डालना शुरू किया। उन्हें पूरा विश्वास था कि इस कड़ाही में उनके हाथ नहीं जलेंगे। आस्था के मुद्दे पर आधुनिक राष्ट्रवाद का ठप्पा लगाना एक बहुत ही अपरिपक्व कदम था कि यह सवाल नेपाल राष्ट्र के उदय से भी पूर्व के इतिहास में पहुंच गया, जब बीसवीं सदी में इस उपमहाद्वीप में राष्ट्र और राज्य के बीच प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत भी नहीं हुई थी। आखिरकार अगर इतिहास के चश्मे से देखें तो इस मुद्दे को ऐसे नहीं देखा जा सकता कि यह पशुपतिनाथ मंदिर में एक भारतीय पुजारी होने का मुद्दा है, बल्कि ये काठमांडू की घाटी में भगवान पशुपतिनाथ की सेवा करने के लिए कर्नाटक के एक कृष्ण यजुर्वेदीय दाक्षिणात्य ब्राrाण के होने का मुद्दा है। आधुनिक युग के अंध उग्रराष्ट्रवादियों को यह तर्क दिए जाने की जरूरत है कि दरअसल हम इस उपमहाद्वीप में बिलकुल उत्तर और सुदूर दक्षिण की दो संस्कृतियों के बीच मेल-जोल की बात कर रहे हैं। और इस मेलजोल से यह सिद्ध होता है कि दो सदी पूर्व तक कैसी शुद्ध परिष्कृत सभ्यता थी, सुदूर दक्षिण तक जिस सभ्यता का प्रचार-प्रसार था। पशुपतिनाथ मंदिर में काफी कुछ बदल गया है। भक्तों के पारंपरिक उपहारों में जबर्दस्त बदलाव आया है और वहां कोई पारदर्शिता नजर नहीं आती जैसाकि कहा जाता है कि तिरुपति में है। ऐसा नहीं है पुजारियों का चयन करने की प्रक्रिया में कभी कोई बदलाव नहीं हो सकता है। काठमांडू के धर्म के प्रकांड विद्वान तर्क देते हैं कि नेपाली नागरिकों को भी वैदिक और कृष्ण यजुर्वेद परंपरा का समुचित प्रशिक्षण दिया जा सकता है। लेकिन मेरा तर्क है कि उस परंपरा का निर्वहन क्यों नहीं किया जाए, जिसकी जड़ें काठमांडू घाटी और नेपाल के दक्षिण एशिया के इतिहास से जुड़ी हैं। पशुपतिनाथ आधुनिक समय के लिए उपयोगी, महत्वपूर्ण मंदिर में बदले और एक ऐसे ट्रस्ट के द्वारा उसका प्रबंधन हो, जो बिलकुल पारदर्शी हो और अच्छे कार्यो में संलग्न हो। बजाय इसके कि पुजारी दान-दक्षिणा पर गुजर-बसर करें, उन्हें तनख्वाह दी जाए। लेकिन इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक बंधन को तोड़ने से पहले दो बार सोचिए, जो दक्षिण एशिया के सुदूर उत्तर और दक्षिण को एकता के सूत्र में बांधता है। -लेखक नेपाल के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं।
काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर के ‘भारतीय’ पुजारी के मुद्दे पर जितना बवाल हुआ है, उसकी जड़ें विदेशी जनों के प्रति उस अज्ञात भय में छिपी हुई हैं। यह भय ठेठ नेपाली राष्ट्रवादी मानस का ही एक हिस्सा है। यही वह सोच है, जिसका इस्तेमाल आधुनिक युग के नेतागण सस्ती लोकप्रियता और समर्थन हासिल करने के लिए करते हैं।