अपने इरादों से सामने वाले पर अनुकूल प्रभाव बनाना भी एक कला है। आपके बोलचाल का तरीका, हावभाव का प्रदर्शन यदि सामने वाले को अनुकूल वातावरण देता है तो प्रबंधक लोग इसे अपनी भाषा में पॉजिटिव स्ट्रोक्स कहते हैं। स्थिति विपरीत हो तभी श्रेष्ठ प्रबंधक के गुणों की सही परीक्षा होती है। हनुमानजी जब लंका पहुंचे तो सारी स्थितियां प्रतिकूल थीं। राक्षसों का वह किला अभेद्य था, ऊपर से माया नगरी। हनुमानजी पहली बार विभीषण से मिले तो उनके मन में यह विचार था कि विभीषण का निवास लगता तो किसी सज्जन का निवास है, लेकिन लंका में किसी का भरोसा नहीं। तो हनुमानजी ने बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तंह आए।। ब्राrाण के रूप में हनुमानजी के हावभाव और अपनी बात का प्रस्तुतीकरण अद्भुत था, जिसे देख विभीषण ने यह मान लिया कि अब रावण का विरोध करना ही ठीक है। इसी तरह जब रावण ने अपने बल को बढ़ा-चढ़ाकर कहा, तब हनुमान बोले - जानउं मैं तुम्हरि प्रभुताई। सहस्रबाहु सन परी लराई॥ समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ अर्थात मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूं। सहस्त्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था। बालि से युद्ध में रावण पराजित हुआ था। एक तरह से हनुमानजी ने यहां रावण का परिहास किया है। हनुमानजी के ये वचन सुनकर रावण खिसियाकर हंस पड़ा। यह पूरी घटना इस बात की शिक्षा देती है कि स्थिति कैसी भी हो, हमें अपनी प्रस्तुति प्रभावशाली रखनी चाहिए।