लेकिन विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने दो-टूक कह दिया कि परदे के पीछे की बातचीत अर्थहीन होगी। जब तक पाकिस्तान अपने यहां पनपे आतंकवाद की जड़ों को सींचना बंद नहीं करता, भारत से कोई सार्थक वार्ता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। न्यूयॉर्क की बैठकों से दोनों देशों को कोई उम्मीद नहीं थी। विदेश मंत्रियों ने न्यूयॉर्क जाने से हफ्ते भर पहले ही कह दिया था कि बातचीत होगी, पर कुछ परिणाम निकलने के आसार नहीं हैं। नतीजा यह हुआ कि आगे की बातचीत की रूपरेखा तक तैयार नहीं हो पाई। स्पष्ट है दोनों अमेरिका के दबाव में मिल तो लिए, पर घोड़े को घाट तक ले जाया जा सकता है, लेकिन जबरदस्ती पानी नहीं पिलाया जा सकता। अब आगे क्या होगा, इस पर दुनिया की नजर है। शर्म-अल-शेख की गलतियों से सीख भारत ने अपना रुख कठोर कर लिया है। भारत आतंक का भुक्तभोगी है और पाकिस्तान ने लश्कर जैसे संगठनों पर सख्ती की सिर्फ बातें की हैं। हाल के खुलासे बताते हैं कि अमेरिका को खुश करने के लिए पाकिस्तान ने लश्कर के कुछ बड़े कमांडर तालिबान के खिलाफ युद्ध में लगा दिए हैं। सत्य यह भी है कि अमेरिका दुनिया से आतंक के सफाए के बारे में गंभीर नहीं है, वह सिर्फ अमेरिका विरोधी आतंकवादी संगठनों पर कार्रवाई होते देखना चाहता है। पाक ऐसा कर भी रहा है तो उसकी कीमत भी वसूल रहा है। हाफिज सईद के बारे में पाक प्रधानमंत्री ने सरासर झूठ बोला कि उसे हिरासत में ले लिया गया है। पाकिस्तान के अधिकारियों ने ही इसका खंडन कर दिया। ऐसे में भारत के सामने अपने दृढ़ संकल्प पर कायम रहने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। चाहे कितना भी दबाव हो, समग्र वार्ता को पुनर्जीवित करने के पहले पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करे। शुरुआत मुंबई हमलों के दोषियों को सजा से हो। पड़ोसी अगर गले मिलना चाहता है तो स्वागत है, पर उसे बगल की छुरी का त्याग करना होगा। अपने नागरिकों का बलिदान कर बातचीत का दिखावा करके पड़ोसी धर्म का निबाह नहीं हो सकता। धर्मो रक्षति रक्षित:।
भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने हाथ मिलाए, बात की और इस बात पर सहमति जताई कि अभी किसी बात पर सहमति नहीं हो सकती। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने प्रस्ताव रखा था कि बैक चैनल से महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत चलती रहे और इसके लिए उन्होंने मंझे हुए राजनयिक रियाज मोहम्मद खान का नाम भी प्रस्तावित कर दिया।