नवनीत गुर्जर। म न भी ब्रह्र। नाद भी ब्रह्म। जो मन से नाद को मिलाए वही मन्ना डे। दरअसल, हवा की तरह संगीत का भी कोई सिरा नहीं होता। शिखर कहीं भी हो सकता है। शुरुआत में भी। आखिर में भी और बीच में भी। मन्ना डे को कुछ इस तरह समझना होगा..
संगीत में सुर दो तरह के होते हैं। विचलित और अविचलित। विचलित वे पांच सुर हैं, जो कोमल भी होते हैं और तीव्र भी। दो सुर- षड्ज और पंचम स्थायी होते हैं। अविचलित और अडिग। न कोमल। न तीव्र। मन्ना डे षड्ज और पंचम के मिश्रण हैं।
षड्ज उनकी आवाज में भारीपन लाता है और पंचम उसमें मुर्कियां पिरोता है। इसीलिए वे मंद्रसप्तक में भी मुर्कियों का प्रयोग करने में माहिर हैं। उनकी यही खासियत उन्हें बाकी गायकों से अलग बनाती है। ‘हंसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है’ में ‘की’ में इतना सुंदर कम्पन मन्ना डे ही दे सकते हैं। एक तरफ वे ‘झनक-झनक तोरी बाजे पायलिया’ की शास्त्रीयता को अक्षुण्ण रखते हैं और दूसरी तरफ ‘ए मेरी ज़ोहरा ज़बी..’ में भारी आवाज के बावजूद शोखी पैदा करते हैं।
यह ‘वक्त’ का तकाजा नहीं, मन्ना दा की गायकी का कमाल है कि यह गाना तब बलराज साहनी पर भी मौजूं था और आज 35 साल बाद का युवा और 90 साल का बुजुर्ग भी इसे अपनी जीवनसाथी के लिए बड़े चाव से गाता है। वे सुरों की खूबसूरती को पात्र के हालात में पिरोते हैं। उनकी आवाज का दर्द उसमें भावनाएं भरता है। यही वजह है कि ‘ऐ मेरे प्यारे वतन..’ को आज भी कोई भारतीय, खासकर बेटी का पिता बिना रोए नहीं गा सकता।
मन्ना डे के व्यक्तित्व और गायकी की महानता यही है कि इतनी खूबियों के बावजूद वे आज के गानों से दूर रहे। षड्ज और पंचम की तरह अटल भी और कर्णप्रिय भी। कह सकते हैं- आधुनिक गानों और उनकी आय की चाह में वे कभी ऋषभ, गंधार या मध्यम नहीं हुए।
षड्ज और पंचम की तरह चिर स्थाई ही बने रहे। फाल्के अवार्ड उन्हें पाकर धन्य हो गया। धन्य इसलिए कि 1959 में नेशनल अवार्ड पाने वाले मन्ना डे को 40 साल बाद फाल्के अवार्ड देना सम चूकने जैसा है। प्रतिक्रिया में संगीत का सामान्य जानकार भी यही कह रहा है।
(लेखक दैनिक भास्कर राजस्थान के स्टेट एडिटर हैं)