साधु-संत कहते हैं संसार और भगवान एक-दूसरे के विपरीत हैं। एक को पकड़ो तो दूसरा छूटेगा। हम संसारियों को यहीं से भ्रम शुरू हो जाता है। कहा गया है संसार पर मत टिको, हम शुरू हो जाते हैं संसार छोड़ने के लिए। टिकने से हटना है छोड़ना नहीं है। आइए, एक रूपक बांधें। दूसरे लोग हमारे और हम दूसरों के मकान को जब बाहर से देखते हैं तो केवल बाउंड्रीवॉल, मेन गेट, ज्यादा से ज्यादा बगीचा देख पाते हैं।
लेकिन वास्तव में मकान इतना ही नहीं होता। भीतर हमारे अपने अंत: कक्ष हैं। भीतर कुछ ऐसी व्यवस्थाएं हैं जहां सिर्फ हम ही होते हैं और जो हमारे लिए ही होता है। बस यही फर्क देह और अंतस का है। संसार बाहर से देखता है और कहता है- आप एक शरीर हो, क्योंकि उन्हें बाहर का ही दिख रहा होता है, परंतु वास्तव में ऐसा है नहीं। शरीर के अतिरिक्त हम भीतर से ‘हम’ हैं। एक तरफ सारी दुनिया, दूसरी ओर हम अकेले। अब हमें इससे मुक्त होना चाहिए, धीरे-धीरे प्रयास करें। संसार छोड़ने का अर्थ यह नहीं कि जंगल-पहाड़ पर कूच कर जाएं।
इसका मतलब है संसार जिस दृष्टि से हमें देख रहा है, बस उस दृष्टि से मुक्त हो जाना। संन्यास यहीं से शुरू होता है। जब भी हम संन्यासरत होंगे, संसार से मुक्त होने लगेंगे। अपने भीतर की आवाज भी सुनेंगे। बाहर दुनिया का शोर जितना कम सुनेंगे, भीतर परमात्मा की आवाज उतनी साफ सुनाई देगी। अपने ही मकान में भीतर जाकर जो सुकून मिलता है वही आनंद शरीर में फासला बनाकर भीतर अंतस में जाने पर मिलेगा, उससे भी कहीं अधिक।