चील को मिला चकमा
ब हुत दिन हुए एक सीधा-सादा, नाटा और बदसूरत देहाती रहता था। उसका नाम था- हाजी बग़लोल। उसकी अजीब-सी बकरे जैसी दाढ़ी थी, जिसकी वजह से वह बिल्कुल बकरे जैसा ही दिखता था। उसने अपनी सारी ज़िन्दगी गांव में ही बिताई थी।
एक बार वह अपनी मौसी के घर दूसरे गांव गया। उसकी मौसी ने उसे कलेजी खाने को दी, जो उसे बहुत स्वादिष्ट लगी। उसने अपनी मौसी से कलेजी बनाने की विधि पूछी। मौसी ने विधि एक कागज़ पर लिखकर हाजी को दे दी।
हाजी बग़लोल ने कागज़ को बहुत सम्भालकर अपनी जेब में रख लिया। रास्ते में उसने एक किलो कलेजी खरीदी और उसे पॉलीथिन में डालकर हाथ में लिए अपने गांव की तरफ जा रहा था कि एक चील ने वह पॉलीथिन देख लिया। बेसब्र चील ने Êाोर से झपटा मारा और कलेजी को लेकर उड़ गई।
पहले तो इस आकस्मिक हमले से हाजी बग़लोल घबरा गए। जब उसने चील को ऊपर उड़ते देखा, तो ठहाका लगाकर हंस पड़ा। जिन लोगों ने यह पूरा वाकया देखा था, वे हैरान थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि गुस्सा करने के बजाए हाजी ठहाका मारकर हंस क्यों रहा है। मानो कोई बहुत खुशी की बात हो।
‘एक तो चील तुम्हारे हाथ से कलेजी ले उड़ी, उस पर तुम हंस रहे हो। ऐसी क्या बात हो गई भाई?’ एक आदमी ने पूछा। उसने खुशी-खुशी कहा,‘मैं तो उस चील की बेवकूफ़ी पर हंस रहा हूं। बेचारी चील कलेजी तो छीन ले गई। उसको बनाने की विधि जो मौसी ने लिखकर दी थी, वह तो मेरी जेब में ही रह गई। अब वह चील कलेजी का करेगी क्या?’
यह कहकर वह फिर हंसने लगा।










