अब रानी मुखर्जी क्या करेंगी?
जयप्रकाश चौकसे Thursday, October 01, 2009 00:31 [IST]  

Rani Mukherjeeदुनिया के महानतम बल्लेबाज सर डॉन ब्रेडमैन अपनी अंतिम पारी में शून्य पर आउट हुए। टेस्ट क्रिकेट में 99 का औसत प्राप्त करने वाला यह सर्वकालिक महान खिलाड़ी अंतिम पारी के शून्य को अपने मन से जल्दी मिटा नहीं पाया।

क्या रानी मुखर्जी भी अपने लंबे सफल कॅरियर की अंतिम पांच फिल्मों की असफलता को पचा पाएंगी? यह भी संभव है कि वह और फिल्में करें, परंतु कौन विश्वास से कह सकता है कि क्या सफल होगा? बतौर निर्देशक आदित्य चोपड़ा की सफलता का प्रतिशत लगभग सौ है। क्या वे रानी मुखर्जी को निर्देशित करेंगे?

दरअसल आदित्य चोपड़ा उम्दा लेखक और कुशल निर्देशक हैं, परंतु उनका एक स्वरूप व्यवहारिक मनुष्य का भी है और बॉक्स ऑफिस पर वह कभी समझौता नहीं करते। वह कम उम्र से ही प्रति शुक्रवार आम आदमियों के साथ नई फिल्में देखते रहे हैं और यही उनकी पाठशाला भी रही है। उन्होंने अपने भाई उदय चोपड़ा को उस फिल्म (मोहब्बतें) में शामिल किया, जिसमें शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन का सुरक्षा दल शामिल था।

आदित्य चोपड़ा जोश में नहीं होश में फिल्म व्यवसाय करते हैं, अत: पांच असफल फिल्मों की नायिका के साथ फिल्म बनाना उनकी सोच प्रणाली में नहीं आ सकता। शायद शाहरुख खान के कवच के साथ भी वे ऐसा खेल न खेलें। यह भी संभव है कि रानी मुखर्जी ही एक और सफलता का मोह छोड़ दें। नरगिस ने ‘मदर इंडिया’ के शिखर पर भी अभिनय छोड़ दिया, जबकि दक्षिण भारत के वासन साहब उनको फि ल्म के पूरे बजट के बराबर धन देकर एक और फिल्म अभिनीत कराना चाहते थे। रमेश बहल मुनमुन सेन के साथ एक भव्य फिल्म करना चाहते थे, परंतु उनकी शर्त थी कि मां-बेटी की इस कहानी में सुचित्रा सेन भी काम करें। सुचित्रा सेन ने साफ इनकार कर दिया। उन्होंने तो अपनी निजता की रक्षा की खातिर दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी अस्वीकृत किया।

जब नेता का एक पैर केले के छिलके पर हो और दूसरा कब्र के अनकरीब, तब भी वे सत्ता नहीं छोड़ना चाहते। अनेक बार हृदय की शल्य चिकित्सा करवाने वाले अजरुन सिंह के मन में आज भी सत्ता का लोभ है। अनेक अवसरों पर अस्वीकृत और अंधेरे राजनीतिक कोने में दुबके आडवाणी संन्यास लेने से कतरा रहे हैं। शासन करने का मोह इतना प्रबल होता है कि औरंगजेब की कैद में शाहजहां से पूछा गया कि जेल में क्या करना पसंद करेंगे तो उन्होंने कहा कि वे बच्चों को पढ़ाना पसंद करेंगे। औरंगजेब मुस्करा दिया कि बूढ़ा ठरकी अभी भी शासन ही करना चाहता है। मास्टर अपनी कक्षा में शहंशाह की तरह होता है।

दरअसल रानी मुखर्जी नरगिस, मीनाकुमारी या नूतन की श्रेणी की कभी भी नहीं रहीं। वह एक समझदार अभिनेत्री हैं और ‘वीर जारा’ में उन्होंने कमाल किया था। रानी चाहती हैं कि उनकी आखिरी फिल्म सफल हो। आज रानी की फिल्मों की सफलता-असफलता का जिक्र उनकी अभिनय क्षमता के कारण नहीं, वरन एक निहायत अच्छा इंसान होने के कारण किया जा रहा है। असल मुद्दा सत्ता के मोह का ही है।

 
 


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