नेपोलियन बोनापार्ट के पराक्रम की चारों ओर तूती बोलती थी। उसने अपने जीवनकाल में बहुतेरी लड़ाइयां लड़ीं और विजयी हुआ। किंतु इस विजय का नशा कभी उसके सिर चढ़कर नहीं बोला। उसके साथ कोई जरा सी भी भलाई कर देता तो वह उसे सदैव स्मरण रखता था और यथासंभव उसका भी भला करने का प्रयास करता। जिन दिनों वह स्कूल में पढ़ता था, तब उसे फल खाने का शौक था। कभी-कभी उसके पास पैसे नहीं होते थे तो एक फलवाली वृद्धा उसे फल उधार दे देती थी। नेपोलियन पर उसका कुछ उधार बाकी था, जो सम्राट बनने के बाद भी उसे याद रहा। जब वह उस शहर गया तो न केवल उस वृद्धा के पैसे चुकाए, बल्कि उसके लड़के को सैनिक स्कूल में अपने खर्चे पर पढ़ने भी भेजा। इसी प्रकार एक दिन नेपोलियन शाम को टहलने निकला। उसकी परिचारिका भी उसके साथ थी। पगडंडी संकरी थी और सामने से एक वृद्धा सिर पर सामान रखे आ रही थी। परिचारिका ने वृद्धा से कहा- सम्राट आ रहे हैं। एक तरफ हट जाओ। नेपोलियन ने यह सुना तो बोला- बूढ़े और बोझ से दबे व्यक्ति का आदर करो। इतना कहकर वह स्वयं पगडंडी के एक ओर खड़ा हो गया और वृद्धा को रास्ता दे दिया। नेपोलियन के जीवन की ये दो घटनाएं हमें सिखाती हैं कि उपलब्धियों से बड़ा बनने के बाद भी विनम्र बने रहना सच्चे अर्थो में बड़प्पन को साकार करता है। किसी ऊंचे मुकाम को हासिल करने के बाद अहंकार ग्रस्त हो जाना जहां अपयश और अवनति का माध्यम बनता है, वहीं विनम्रता निरंतर उन्नति और यशवर्धक होती है।