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जिंदगी के खेत में फसल उसी की, बीज है जिसका
पं. विजयशंकर मेहता Thursday, October 01, 2009 00:53 [IST]  

हमने कभी किसी का बुरा नहीं किया, फिर हमारे साथ ईश्वर ने ऐसा क्यों किया, इस आदर्श वाक्य को हम लोग आए दिन दोहराते हैं। हमारे ऊपर आई दुख की घड़ी में परमात्मा की ओर उछाला गया यह पहला पार्थिव संवाद होता है। सोचिए, यदि हमें कभी ईश्वर मिल जाए और यही प्रश्न हम उनके सामने रख दें तब पूरी दृढ़ता से उनका जवाब यह होगा कि संभव ही नहीं है कि आप भला करो और आपके साथ बुरा हो जाए।

उस सबके मालिक के खेत का कायदा कड़क है। बीज नीम का होगा तो फसल आम की उगेगी ही नहीं। परमात्मा कहता है, फसल कभी झूठ नहीं बोलती। बीज, पेड़, फसल झूठ नहीं बोलते, मनुष्य की बात और है। आइए, ऊपर वाले से ही जवाब मांगें तो फिर झंझट कहां हो जाती है। काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मात्सर्य जैसे विकारों की मदहोशी में हम दावा करते हैं, बीज आम का है पर वह था नीम का। भगवान का दृढ़ उत्तर है। मैं शुभ के बीज में अशुभ की फसल नहीं देता। कई बार भलाई करते समय हम भला काम कर तो रहे होते हैं लेकिन भीतर से हमारा मन स्वीकार नहीं कर रहा होता है।

मजबूरी, कानून का भय, समाज की मर्यादा के कारण ऊपर ऊपर भलाई हो रही होती है। मन तैयार नहीं रहता। प्रत्यक्ष पाप के हिसाब तो नीचे दुनिया में रख लिए जाते हैं। पर अप्रत्यक्ष हो गए गलत कामों का बहीखाता सिर्फ ऊपर वाले के पास होता है। इसलिए होश जगाएं अपने भीतर का। तब इस पीड़ा का उत्तर मिल जाएगा कि हमारे साथ ऐसा क्यों हो जाता है। जब कभी भी ऐसा हो जरा मुस्कराइए..।

 
 


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