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जिंदगी की अंतिम सांस तक गाता रहूंगा
Bhaskar News Thursday, October 01, 2009 00:56 [IST]  

Manna Deyभारतीय परम्परा में फिल्मी म्यूजिक अपनी शुद्धता लगातार खोता जा रहा है और अपनी बुनियाद से दूर खिसकता जा रहा है। आज के म्यूज़िक में भारी-भरकम रॉक मिलेगा, गीतों का भव्य फिल्मांकन मिलेगा और हड्डियां तोड़ने वाला डांस मिलेगा। लेकिन इस वजह से भारतीय फिल्मों के गीत-संगीत से वह मधुरता गायब हो चुकी है, जिसके लिए कभी वह जाना जाता था।

1. कृत्रिम ध्वनियों और आधुनिक वाद्य यंत्रों की वजह से संगीत की गुणवत्ता में गिरावट आई है। इसमें अब संगीतकारों की वैसी लगन नहीं रही है जितनी कभी हुआ करती थी। कंप्यूटर जनित ट्रैक रिकॉर्डिग की वजह से अब किसी युगल गीत को गाने के लिए गायक-गायिका का साथ गाना जरूरी नहीं रह गया है, लेकिन इसकी वजह से संगीत की आत्मा मर गई है।

2. कई लोग मुझसे असहमत हो सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि मोहम्मद रफी शास्त्रीय संगीत के साथ बहुत सहज महसूस नहीं करते थे। हालांकि उनकी आवाज ईश्वर का वरदान थी और ऐसा वरदान हर किसी को नहीं मिलता। वे जो भी गाना गाते थे, उसमें रफी साहब की अपनी छाप होती थी। उनके जैसा सिंगर न तो कभी हुआ था और न ही कभी होगा।

3.  हमारे जमाने के फिल्मकार भी बहुत अलहदा हुआ करते थे। रिहर्सल के दौरान वे खुद हमारे साथ बैठते थे और गीत को समझने की कोशिश करते थे। इनमें एक नाम मैं राज कपूर साहब का गिना सकता हूं।

4.  पुरस्कारों और सम्मानों को लेकर मेरी ज्यादा दिलचस्पी कभी नहीं रही है। मिल गए तो ठीक हैं। मेरे लिए जो बात सबसे ज्यादा मायने रखती है, वह है मेरी गायिकी। मैं जिंदगी की आखिरी सांस तक गाता रहूंगा।

(विभिन्न इंटरव्यू में व्यक्त मन्ना डे के विचार)

 
 


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