25 साल से बोफोर्स के भूत ने भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा होने से रोका है। हावित्जर तोपों की खरीद के बाद देश की सरकारों ने मानो तोपों की खरीदारी से तौबा कर ली थी। सेना के हाय-तौबा मचाने के बाद भी आश्वासन और बयानबाजी को हथियार बनाया, पर खरीदी का जोखिम कोई उठाना नहीं चाहता था। कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोपों ने ही देश की लाज रखी थी। सेना का कहना है कि उसे ऐसी ही कारगर, पर हलकी तोपों की जरूरत है, जिन्हें आसानी से दुर्गम स्थानों पर पहुंचाया जा सके। बोफोर्स, जो अब बीएई सिस्टम्स कहलाती है, पहले ही दागदार थी। द. अफ्रीका की डेनेल 2005 में काली सूची में चली गई, फिर इजरायल की सोल्तम और हाल में सिंगापुर टेक्नोलॉजीज, को भी दलाली की आशंका में ब्लैक लिस्ट कर दिया गया। देश के रक्षा सौदों को मानो एक घोटाले की नजर लग गई थी। उधर पाकिस्तान ने आतंक के खिलाफ युद्ध के नाम पर अमेरिका से 67 आधुनिक 155एमएम हावित्जर मंगा लिए, इसके पहले तुर्की ने पाकिस्तान को ऐसी ही तोप मुहैया करवाई थी। भारत की बोफोर्स हावित्जर अस्सी के दशक में बनी थी और इन सालों में तकनीक बहुत आगे जा चुकी है। अगस्त के महीने में रक्षा मंत्री ने कहा कि सेना को तोपों के आधुनिकीकरण के लिए 20,000 करोड़ रुपए मिले हैं और सेना जल्दी ही दो हजार से ज्यादा आर्टिलरी गन खरीद सकेगी। 44 स्क्वाड्रन की जरूरत वाली वायुसेना के फाइटर स्क्वाड्रन घटकर 32 रह गए हैं और 126 नए मल्टी-रोल विमान खरीदने की योजना अधर में है। नौसैना को तीन विमान वाहक पोत चाहिए, अभी जो एक है वह भी मरम्मत में है। पाक ने आधुनिक फ्रेंच सबमरीन को अपने बेड़े में शामिल कर लिया है, पर भारत स्कोर्पिन के इंतजार में है। उम्मीद है कि भारत सरकार हथियार खरीदने की प्रक्रिया को स्वच्छ और पारदर्शी बनाने के साथ-साथ सरल भी बनाएगी, क्योंकि भारत और उसके पड़ोसियों के बीच का सैन्य संतुलन बिगड़ता दिख रहा है। यह संतुलन दक्षिण एशिया में शांति के लिए भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि युद्ध के लिए।
देश के सबसे मशहूर रक्षा सौदे और उसमें हुए घोटाले का पटाक्षेप ऐसा होगा, किसी ने सोचा नहीं था। केंद्र सरकार ने सीबीआई से इटली के व्यापारी ओट्टावियो क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमे वापस लेने को कहा है। राजनीतिक विवाद शायद इतनी जल्दी खत्म नहीं हो, पर इस मुकदमे से सबसे ज्यादा नुकसान देश की सेना को हुआ है और अब उसे निजात मिलनी चाहिए।