जब मन्ना डे ने पाश्र्वगायन के क्षेत्र में प्रवेश किया तब दिलीप कुमार के प्रिय गायक रफी साहब थे, राज कपूर के लिए मुकेश और देव आनंद के लिए किशोर कुमार थे। मन्ना डे की किस्मत में सुपर सितारे नहीं थे, परंतु उन्होंने तो बुड्डू आडवाणी जैसे जूनियर कलाकार के लिए ‘लपक झपक तू आ रे बदरवा, मेरे घड़े में पानी नहीं है’ (फिल्म - बूट पॉलिश) जैसा सुपरहिट गीत गाया। उन्होंने हास्य कलाकार मेहमूद के लिए दर्जनों सुपरहिट गीत गाए। वे शंकर-जयकिशन, राज कपूर और मुकेश की मित्रता से परिचित थे, परंतु उन्होंने राज कपूर के लिए ‘प्यार हुआ इकरार हुआ, प्यार से फिर क्यों डरता है दिल’(श्री 420), ‘आजा सनम मधुर चांदनी में हम’, ‘ये रात भीगी-भीगी’ और ‘जहां मैं जाती हूं वहीं चले आते हो’ (चोरी चोरी) जैसे सर्वकालिक महान प्रेम युगलगीत गाए। ‘चोरी चोरी’ के लिए शंकर-जयकिशन को पहली बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उन्होंने एक निहायत ही डरावने बदसूरत आदमी के मेकअप में अशोक कुमार के लिए ‘पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई’ गाया। इस गीत को कभी भी कितनी बार भी सुनो, आंखें नम हो जाती हैं। दर्द की ऐसी अभिव्यक्ति किसी और के बस की बात नहीं थी। मोहम्मद रफी और मन्ना डे के एक ही कालखंड में सक्रिय होने के कारण मन्ना डे की प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हो पाया। स्वयं रफी साहब मन्ना डे के जबरदस्त प्रशंसक थे और उस दौर के सारे गायक जलन और टुच्चेपन से मुक्त थे। वे एक-दूसरे की कमजोरी नहीं वरन ताकत थे। मन्ना डे और रफी का शास्त्रीय संगीत का ज्ञान और नियमित रियाज कमाल का था। रफी साहब ने दिलीप कुमार के लिए फिल्म ‘कोहिनूर’ में एक शास्त्रीय गाना (मधुबन में राधिका नाचे रे..) गाया तो मन्ना डे ने राज कपूर के लिए ‘दिल ही तो है’ में (लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे..) गाया। दिलीप कुमार और राज कपूर ने इन शास्त्रीय गीतों की अदायगी ऐसे की, मानो वे शास्त्रीय घरानों में ही पैदा हुए थे। उस दौर में प्रतिस्पर्धा को खेल भावना से लिया जाता था। किसी तरह का क्षेत्रवाद भी नहीं था। मन्ना डे बंगाली हैं, परंतु शंकर-जयकिशन के लिए उन्होंने बहुत काम किया। फिल्म ‘सीमा’ का गीत ‘तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूंद के प्यासे हम’अविस्मरणीय रचना है। ‘दिन अलबेले प्यार का मौसम, चंचल मन में तूफान, ऐसे में कर ले तू प्यार’ उपरोक्त गीत फिल्म ‘बेगुनाह’ (संगीत : शंकर-जयकिशन) का है और मन्ना डे द्वारा गाया यह गीत किशोर कुमार पर फिल्माया गया है। जब राहुल देव बर्मन फिल्म ‘पड़ोसन’ के लिए गीत रच रहे थे, तब मन्ना डे ने कहा कि इस शास्त्रीय रचना में आप मुझे किशोर कुमार से हारते हुए कैसे रिकॉर्ड कर सकते हैं। फिल्म का दृश्य कुछ ऐसा था कि किशोर कुमार बेसुरे नायक सुनील दत्त के लिए पाश्र्व गायन कर रहे हैं और प्रतियोगिता सुनील दत्त तथा मेहमूद के बीच है। मन्ना डे ने इसमें मेहमूद के लिए आवाज दी। गीत था- ‘इक चतुर नार करके श्रंगार’। मुंबइया फिल्मों के साथ ही मन्ना डे ने बंगाली भाषा में फिल्मी और गैर-फिल्मी सैकड़ों गीत गाए हैं। दरअसल मन्ना डे की भाषा माधुर्य थी। वह क्या अद्भुत कालखंड था जब लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और मन्ना डे सक्रिय थे। आशा भोंसले, मुकेश, तलत और हेमंत कुमार ने भी इसी कालखंड में अपना स्थान बनाया। आज मन्ना डे को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार दिया जा रहा है और यह भारतीय फिल्म संगीत के उस स्वर्णकाल का सम्मान ही माना जाना चाहिए। जब मन्ना डे इसे स्वीकार करेंगे, तब रफी साहब की आत्मा वहां अवश्य मौजूद होगी और समवेत करतल ध्वनि में उनकी गमक स्पष्ट सुनाई देगी।
मन्ना डे को जीवन में हर चीज देर से मिली है- पैसा, नाम और पुरस्कार। उम्र की संध्या में उन्हें उच्चतम दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया है। अपनी जवानी में उन्हें अखाड़े जाकर दंड पेलने और कुश्ती लड़ने का शौक था और वे मिट्टीपकड़ पहलवान माने जाते थे, अर्थात आप उन्हें पटक सकते हैं, परंतु चित नहीं कर सकते। जीवन और गायन में भी मन्ना डे मिट्टीपकड़ पहलवान ही सिद्ध हुए।