वेक अप सिड : युवा मनोरंजन का शंखनाद
जयप्रकाश चौकसे Saturday, October 03, 2009 00:16 [IST]  

Wake up Sidजब भी मनोरंजन परिदृश्य में घिसी-पिटी फिल्मों का दौर लंबे समय तक चलता है और जब आप निराश हो जाते हैं, तब कोई युवा फिल्मकार सिनेमा में ताजगी लेकर आता है और आपका विश्वास लौट आता है। अयान मुखर्जी ने अपनी पहली ही फिल्म ‘वेक अप सिड’ में लगभग वैसा ही स्वस्थ सार्थक मनोरंजन दिया है जैसे इम्तियाज अली ने ‘जब वी मेट’ में दिया था। रणबीर कपूर और कोंकणा सेन शर्मा ने इसमें सजीव अभिनय किया है, परंतु यह फिल्म हमेशा लेखन और निर्देशन के लिए याद की जाएगी।

अयान मुखर्जी ने युवा प्रेम कहानी को इतने मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत किया है कि आपको अपने अनुभव और जीवन की याद ताजा होती है। ऐसा लगता है कि सारे पात्र और घटनाएं हमने देखी हैं। अयान मुखर्जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी पटकथा है, जो लहर-दर-लहर कविता की मानिंद बहती है। उनके सहज और स्वाभाविक प्रभाव में कहीं भी अतिरेक का बाढ़ समान उफान नहीं है। हर पात्र रोजमर्रा के जीवन में बोली जाने वाली अपनी भाष बोलता है।

नायक के पड़ोस में रहने वाली महिला उससे अपने बच्चे की तस्वीरें खींचने का आग्रह करती है और अगली लहर में वह अपनी मां से मिलने जाता है, जिससे वह गलत बात पर झगड़ा करके गया था। यह लेखन का कमाल है कि जाते-जाते वह अपनी मां से कहता है कि वह जानता है कि आम मां ने ही लाकर दिए थे। इस निर्देशक को किफायत से संवेदना जगाने में महारत इस कदर हासिल है कि क्लाइमैक्स में नायक नायिका का कुर्ता पहनता है जो भूलवश उसके सामान के साथ आ गया था। यह कुर्ता पहनना ही उसके अहसास को अभिव्यक्त करता है कि वह नायिका को प्यार करता है, जिसके साथ अब तक लड़ते-झगड़ते ही समय बीता है।

इस युवा प्रेमकथा में माता और पिता का चरित्र चित्रण भी गहरी संवेदना के साथ हुआ है। किस तरह एक उद्दंड लापरवाह युवा अपने माता-पिता को समझता है, इसका क्रमिक विकास फिल्म में बहुत गहराई से हुआ है। यह युवा प्रेमकथा संवेदना के चोर रास्ते से कब पारिवारिक फिल्म बन जाती है, यह दर्शक धीरे-धीरे ही महसूस करता है।

यह रणबीर कपूर की तीसरी फिल्म है, परंतु पहली बार उनकी गहराई का अंदाज लगता है। एक भ्रमित युवा के मन में आने वाले तमाम भाव और सूक्ष्म संवदेनाएं उन्होंने बखूबी प्रस्तुत की हैं। अपने सुंदर चेहरे को उन्होंने अपने दिल के आईने की तरह प्रस्तुत किया है, उनकी आंखें बोलती हैं। कोंकणा सेन शर्मा अपने अभिनय से पहले ही प्रभावित कर चुकी हैं, परंतु इस फिल्म में उन्होंने अत्यंत मर्मस्पर्शी काम किया है। वह पारंपरिक रूप से सुंदर नहीं हैं, परंतु भावना की सशक्त अभिव्यक्ति के क्षणों में बहुत सुंदर लगने लगती हैं।

छोटी भूमिकाओं में सभी कलाकार एक बड़े चंद्रहार में नगीने की तरह जड़े हुए से लगते हैं। जब नायक परीक्षा में फेल होने को लेकर अपनी चिड़चिड़ाहट में मोटी लड़की से कहता है कि तुम टॉपर मुझ असफल का दर्द कैसे जान सकती हो, तो मोटी लड़की कहती है कि रोज सुबह वजन कम करने के लिए डायटिंग शुरू करके शाम तक असफल हो जाती हूं। इस तरह फिल्म में अनेक बातें हैं जिन्हें निर्देशक ने पेंटर के स्मॉल स्ट्रोक्स की तरह इस्तेमाल किया है। अंत में निर्माता करण जौहर को बधाई जिन्होंने अयान मुखर्जी को अवसर दिया। कुछ ही वर्षो में करण जौहर सफलतम निर्माता सिद्ध होंगे। वे अपने अन्य मित्रों की तरह भटके नहीं हैं।

 
 


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