बांधवगढ़ के जंगल में सब जानवर अत्यंत भाईचारे के साथ रहते थे। लेकिन जब से चिक्कू खरगोश ने यह सुना कि कछुए के किसी पूर्वज ने उसके पूर्वज को कभी दौड़ में हराया था, तब से वह अपने दोस्त झब्बू कछुए के पीछे पड़ गया। वह उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता था। वैसे भी उसकी डींग मारने की बुरी आदत थी।
कछुआ फरि जीत गया। एक दिन चिक्कू चौपाल पर अपने मित्रों के बीच हमेशा की तरह डींग हांक रहा था, तभी उसकी निगाह झब्बू कछुए पर पड़ी। चिक्कू उसकी ओर देखते हुए उपहास से बोला, ‘दोस्तो, आप सबने यह गप्प Êारूर सुनी होगी कि इस कछुए के पूर्वज ने मेरे किसी पूर्वज को हराया था। इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है? कहां हम तेÊा दौड़ने वाले खरगोश और कहां इसके जैसे रेंग कर कीड़े की तरह चलने वाले कछुए।
यह इनके किसी बदमाश पूर्वज द्वारा हमारी जाति को नीचा दिखाने के लिए उड़ाई गई गप्प मात्र है। अगर हिम्मत है, तो झब्बू मुझे हराकर दिखाए। तब मैं मान लूंगा कि यह बात सच थी अन्यथा इसे अपने पूर्वजों की इस गप्प के लिए हमसे माफी मांगनी होगी।’
सभी जानवर चिक्कू से चिढ़ते थे। उन्हें झब्बू की होशियारी पर पूरा भरोसा था। अत: सब उससे आग्रह करने लगे कि चिक्कू को हराकर उसका घमंड चूर कर दे। आखिरकार अपने साथियों के आग्रह के कारण झब्बू को न चाहते हुए भी दौड़ के लिए तैयार होना पड़ा।
दौड़ का दिन दो दिन बाद का निर्धारित किया गया। झब्बू सबके कहने पर तैयार हो गया किंतु उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि चिक्कू जैसे तेÊा धावक को वह कैसे हराएगा? उसे यह सोचकर घबराहट हो रही थी कि यदि वह हार गया, तो उसके पूर्वज झूठे सिद्ध हो जाएंगे और उनकी बदनामी का जिम्मेदार वह स्वयं होगा।
अगले दिन झब्बू दौड़ के लिए निर्धारित मार्ग को देखने गया। एक मील लंबी दौड़ में काली चट्टान पर लगी झंडी को लेकर वापस आना था। अचानक गाजर के कुछ पौधे देखकर झब्बू खुश हो गया। उसका दिमाग कम्प्यूटर की तरह तेज़ चलने लगा। उसे लगा शायद अब जीत की सम्भावना बन सकती है।दौड़ वाले दिन झब्बू सुबह जल्दी उठकर उस जगह पहुंच गया और चुपके से उसने ज़मीन में से गाजरें खोदकर फैला दीं।
निर्धारित समय पर जंगल के सारे जानवर इस अनोखी दौड़ को देखने के लिए इकट्ठे हो गए। चिक्कू एवं झब्बू भी तैयार होकर आ गए। सारे जानवर उत्सुक थे कि देखें आज क्या होता है? बुद्धिमान झब्बू कैसे अपने से कई गुना तेज़ दौड़ने वाले चिक्कू को हरा पाता है? सभी मन ही मन उसकी जीत की कामना कर रहे थे।
इससे पहले कि दौड़ शुरू होती, चिक्कू खरगोश हाथ उठाकर बोला,‘साथियो, मुझे नहीं मालूम कि यह रेंगकर चलने वाला कछुआ जो कि दो कदम भी मेरे साथ नहीं भाग सकता, कैसे मेरे साथ रेस करेगा? वैसे तो मैं इसे मिनटों में हरा सकता हूं किंतु आप लोगों को इस रेस में थोड़ा मÊा आए, यह सोचकर मैंने निश्चय किया है कि इस ओर से मैं इसके साथ-साथ चलूंगा, परंतु झंडी लेने के बाद फुर्र से रॉकेट की तरह उड़ता हुआ वापस आ जाऊंगा।’
चिक्कू की दंभभरी बात किसी को पसंद नहीं आई, परंतु कोई कर भी क्या सकता था? सभी सोच रहे थे कि काश कोई चमत्कार हो जाए और झब्बू रेस जीत जाए।
शेर महाराज के संकेत करते ही दौड़ शुरू हो गई। झब्बू ने तेज़ कदमों से चलना शुरू किया। चिक्कू भी उसके साथ-साथ चलने लगा। वह साथ-साथ उसकी हंसी भी उड़ाता जा रहा था। अचानक थोड़ी दूर चलने पर चिक्कू को रास्ते के किनारे गाजरों का ढेर दिखाई दिया। गाजर उसकी कमजोरी थी। लाल-लाल गाजरें देखकर उसके मुंह में पानी आ गया। झब्बू ने उसकी मन:स्थिति भांपकर कहा,‘पता नहीं किसने यहां गाजरें फेंक दी हैं? पर क्या फायदा, अब इतनी महत्वपूर्ण रेस छोड़कर कोई गाजर खाने में तो नहीं लग जाएगा?’
‘रेस तुम्हारे लिए महत्वपूर्ण होगी, मेरे लिए नहीं। मैं तो वैसे भी चुटकी बजाते हुए रेस जीत लूंगा। तुम दौड़ना जारी रखो। मैं एक मिनट में गाजर खाकर आता हूं।’ चिक्कू ने कहा।झब्बू यही तो चाहता था। सब कुछ उसकी प्लानिंग के अनुसार हो रहा था। उसने दौड़ना जारी रखा। चिक्कू ने गाजर के ढेर पर छलांग लगाई और उन्हें खाना शुरू कर दिया। इधर चिक्कू को गाजर खाते-खाते समय का पता ही नहीं चला और उधर झब्बू लगातार चलता हुआ काली चट्टान तक पहुंच गया।
उसने झंडी लेकर वापस लौटना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद झब्बू उसी झाड़ी के पास से निकला, तब तक चिक्कू गाजरें ही खा रहा था। झब्बू को देखकर वह व्यंग्य से बोला,‘जाओ जितनी दूर तक जा सकते हो, उतना रास्ता तो मैं मिनटों में ही तय कर लूंगा।’ झब्बू हंस दिया और चलता रहा। कुछ ही देर में वह चिक्कू की आंखों से ओझल हो गया।
चिक्कू ने गाजरें खाने में समय लगा दिया और झब्बू ने देखते-ही-देखते जीत की रेखा पार कर दी। इस तरह जंगल में एक बार फिर इतिहास दोहराया गया। खरगोश फिर कछुए से हार गया। हमेशा की तरह बुद्धि के आगे ताकत को घुटने टेकने पड़े।
कहानी-प्रतिभा अग्निहोत्री
उज्जैन, मप्र