ये मुंबई है मेरी जान
जयप्रकाश चौकसे Monday, October 05, 2009 00:08 [IST]  

Parde Ke Peechheमहात्मा गांधी की जयंती दो अक्टूबर को बेचारे करण जौहर को राज ठाकरे से क्षमायाचना करनी पड़ी। अगर वह ऐसा नहीं करते तो उनकी फिल्म ‘वेक अप सिड’ का प्रदर्शन राज की सेना रोक देती, क्योंकि फिल्म में दो पात्र ग्यारह बार बंबई कहते हैं और राज की जिद है कि मुंबई कहा जाए। उस मुंबई में अनेक जगह महात्मा गांधी की प्रतिमाओं से वर्ष भर की धूल और परिंदों की गुस्ताखियों को धोकर साफ किया गया और किसी गरीब फूल वाले को धमकाकर मुफ्त की मालाएं चढ़ाई गईं।

एक तरफ राष्ट्रपिता का सम्मान चल रहा था, दूसरी ओर हिटलरशाही के सामने एक कर्मठ और करोड़ों रुपए टैक्स और मनोरंजन के रूप में जमा करने वाले करण जौहर को शर्मसार किया जा रहा था। सत्ता की खातिर मुंबई की मौजूदा कांग्रेस गठबंधन सरकार के परोक्ष प्रश्रय में यह तानाशाही पनप रही है, ताकि शिवसेना का वोट बैंक क्षतिग्रस्त हो और ये सत्ता पर पुन: काबिज हों। देश को खंडित करने के प्रयास में सारे दल शामिल हैं।

बहरहाल करण जौहर के मन पर क्या बीत रही होगी? धन का जोखिम उठाकर सार्थक सिनेमा रचने पर दंडित किया जा रहा है और सुरक्षा की जवाबदारी लेने वाली सरकारें तमाशबीन हैं। इस प्रकरण में आम आदमी का दोष भी कम नहीं है। ये उसी के भ्रमित मत हैं, जिनके दम पर दादागीरी की जा रही है। यह भी अजीब बात है कि महाराष्ट्र के बाहर देश-विदेश के अनेक शहरों में बसे मराठी बोलने वाले लोग अपने कला-प्रेम और राष्ट्रीय निष्ठा के लिए सराहे जाते हैं और महाराष्ट्र में रहने वाले अनेक लोग इस संकीर्णता का मौन समर्थन करते हैं। चिराग तले अंधेरा है।

आज के दौर में महज कुछ दर्जन गुंडे पालकर आप एक महानगर के जन-जीवन को अवरुद्ध कर सकते हैं। हुल्लड़बाजी का ऐसा गहरा और व्यापक प्रभाव पहले कभी नहीं देखा गया। शायद आज हर आदमी स्वयं को तन्हा और असुरक्षित महसूस करता है। डर और असुरक्षा का यही भाव कबीला प्रवृत्ति को पुन: जीवित कर रहा है। छोटे-छोटे संगठन और जनाधार रहित दल संसद में सौदेबाजी कर लेते हैं। जिस बड़े नेता के उतंग मस्तिष्क को हम नमन करने के लिए झुकते हैं, तो हम देखते हैं कि इस लौह पुरुष के पैर मिट्टी के हैं, घुटनों की जगह रबर की गेंद लगी है और मेरुदंड में च्यूइंगम भरा है।

महात्मा गांधी ने सबसे पहले अपने दिल में बसे डर से मुक्त होना सिखाया था। 1913 में कथा फिल्म प्रारंभ हुई और 1914 में गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत आए। उनकी डर मुक्त जनता ने सिनेमा की नई विधा को सराहा। मनोरंजन उद्योग डर मुक्त समाज में ही पनपता है। सिनेमा को गांधीजी से सहयोग मिला और सिनेमा ने भी गांधीवाद का जमकर प्रचार किया। इंदौर के श्री सुमन चौरसिया के संग्रह में अनेक गीत हैं जो ब्रिटिश सेंसर की आंख में धूल झोंककर प्रस्तुत किए गए थे। बहरहाल करण जौहर का आत्मसम्मान डगमगाया है, परंतु हमारे देश में व्यक्ति के सम्मान को कभी अक्षुण रखने का प्रयास नहीं होता। हेल हिटलर!

 
 


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