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यह गांधी का देश तो नहीं
भीखू पारेख Monday, October 05, 2009 00:30 [IST]  

Bhikhu Parekhहमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मोक्ष प्राप्ति के अपने लक्ष्य को निश्चित रूप से हासिल कर लिया होगा और इसलिए उनके धरती पर वापस लौटने की संभावना न के बराबर है। हालांकि यदि गांधीजी ऐसा करते हैं तो उन्हें वर्तमान भारत के कई पहलुओं को देखकर बहुत दुख पहुंचेगा। उन्हें यह देखकर भयंकर सदमा लगेगा कि देश के प्रत्येक क्षेत्र में भ्रष्टाचार ने कितनी पैठ बना ली है।



सार्वजनिक जीवन में महात्मा गांधी और उनके सहयोगी उच्च नैतिकता के जो मानदंड आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ गए थे, वे काफी तेजी से दरके हैं। छोटे सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार ही उन्हें चिंतित नहीं करेगा, बल्कि इससे ज्यादा परेशान तो वे इस बात से होंगे कि कैसे हम भारतीय व्यक्तिगत स्वार्थो की वेदी पर राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाते जा रहे हैं। नीम पर करेला यह कि इसके लिए किसी भी व्यक्ति को कोई दुख या पश्चाताप तक नहीं है।



गांधीजी देश में विकराल रूप से फैली गरीबी और दारुणता को देखकर शायद और भी अधिक दुखी होंगे। अगर एक डॉलर प्रतिदिन आय के सरकारी मानदंड के हिसाब से देखें तो देश की 25 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। लेकिन यदि इस गरीबी को कैलोरी उपभोग और बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के पैमाने पर तोलें तो यह संख्या 60 फीसदी को भी पार कर जाएगी। गांधीजी के लिए यह बात राष्ट्रीय शर्म से कम नहीं होगी। वे इसे अपनी विरासत के साथ धोखा मानेंगे, क्योंकि आजादी के बाद 60 सालों में देश में गरीबी के उन्मूलन और आर्थिक विषमता की खाई को पाटने के लिए किसी भी तरह के व्यवस्थित प्रयास नहीं किए गए।



महात्मा गांधी देश के प्रेरक नैतिक नजरिए के अभाव को लेकर भी निश्चित रूप से व्यथित होंगे। देश ने 2020 तक पांच से सात फीसदी की विकास दर के साथ दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बनने का लक्ष्य तय कर रखा है। लेकिन गांधीजी निस्संदेह इस पर सवाल उठाएंगे। आर्थिक विकास से प्रकृति का दोहन होता है, असमानता की खाई और गहरी होती है, सामाजिक व राजनीतिक संस्थानों पर दबाव बढ़ जाता है और अंधाधुंध उपभोग की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है।



आर्थिक विकास एक उचित साध्य तक पहुंचने का साधन जरूर हो सकता है, लेकिन यह स्वयं साध्य भला कैसे हो सकता है? गांधीजी हमारे कर्णधारों से जानना चाहेंगे कि आखिर आर्थिक विकास के जरिए हमने देश के सामने ऐसे कौन से महान नैतिक और राजनीतिक आदर्शो को साकार करने का लक्ष्य रखा है। वे यह बात भी जानने के इच्छुक होंगे कि महज आर्थिक विकास के माध्यम से हम कैसे भारत को एक मानवीय और सद्भावना से परिपूर्ण समाज बना सकेंगे।



बापू को नव मध्यम वर्ग में सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति बढ़ती उपेक्षा और नैतिक आदर्शो के अभाव से भी आघात लगेगा। यह मध्यम वर्ग ही था जिससे उन्हें आजाद भारत में काफी उम्मीदें थीं। उनके जमाने का मध्यम वर्ग सामाजिक रूप से काफी सजग था। वह भारतीय और पश्चिमी परंपराओं दोनों के साथ सहज था। वह अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ भी था और उन्मुक्त भी था। मानव जीवन के प्रति उसका नजरिया बहुत गंभीर नैतिकता लिए हुए था। उसके अपने कुछ पैमाने थे, कुछ मानदंड थे। उन्हीं से वह प्रेरणा पाता था। जब वह अपने पैमानों पर खरा नहीं उतर पाता था तो उसके लिए उसे दुख भी होता था और पश्चाताप भी।



आज का नव मध्यम वर्ग इससे कहीं अलग है। सामाजिक चेतना का उसमें सख्त अभाव है और अच्छा या बुरा जो भी हो रहा है, उससे उसका कोई लेना-देना नहीं है। वह जड़विहीन है। न तो वह अपनी संस्कृति का जानकार है और न पश्चिमी संस्कृति का। वह सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से असुरक्षित महसूस करता है और उसे हर समय भय सताता रहता है। उसकी मुख्य चिंता एक ही है कि कैसे वह अधिक से अधिक पैसे कमा सकता है, ताकि वह उसे अपनी तुच्छ महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए खर्च कर सके।



यहां सवाल यह उठता है कि ऐसे हालातों से रूबरू होकर गांधीजी क्या करते? वे संभवत: ये पांच कदम उठाते। पहला, वे विषमता और अन्याय के ऐसे मामलों, जिनकी साफ तौर पर पहचान हो चुकी है, के खिलाफ सत्याग्रह शुरू करते। ऐसा करते समय वे अन्याय के शिकार हुए लोगों को हिंसात्मक नक्सलवाद की जगह एक नया शांतिपूर्ण विकल्प सुझाते।



दूसरा, वे अपने कार्यकर्ताओं का एक राष्ट्रव्यापी संगठन बनाते। उसे शायद वे लोक सेवक संघ नाम देते। इसमें समाजसेवा के प्रति समर्पित लोगों को रखते। इन लोक सेवकों को वे गांवों में भेजते। उनसे अपेक्षा होती कि वे गांवों में स्थानीय समस्याओं को देखें और स्थानीय सत्ता केंद्रों पर नजर रखें ताकि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखा जा सके।



तीसरा, वे भ्रष्टाचार विहीनता का व्यक्तिगत उदाहरण पेश करते और अपने निकट सहयोगियों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करते। इससे देश की जनता के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ एक व्यापक संदेश जाता, जिससे भविष्य में जरूरत पड़ने पर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की मजबूत नींव पड़ती।



चौथा, वे स्वयं अपना राजनीतिक आंदोलन शुरू कर देते। इससे आदर्शो से भटके हुए और सिद्धांतहीन राजनीतिक दलों का सफाया होता और नए राजनीतिक दल के गठन के लिए जगह बनती। यह ऐसा दल होता जो गांधीजी के आदशरें से प्रेरित होता और आम जनता व गरीबों के हितों के लिए कार्य करता।



और पांचवां व अंतिम, वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी स्थिति आने पर वे ऐसे रास्ते की तलाश करते जिससे कि इस समस्या का शांतिपूर्ण तरीकों से समाधान किया जा सके। वे हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मो के नेताओं पर एक समझौते पर पहुंचने के लिए दबाव डालते। जब महात्मा गांधी ऐसा प्रयास करते तो यह तय था कि कोई न कोई बीच का रास्ता जरूर निकलता और दोनों धर्मो के नेता किसी न किसी समझौते पर अवश्य पहुंचते। संभव था कि गांधीजी इस स्थान पर ऐसे बहुधार्मिक परिसर के निर्माण का सुझाव देते जो भारत की धार्मिक बहुलता के प्रति प्रतिबद्धता का ही प्रतीक होता।

गांधीजी के प्रयासों के बावजूद यदि हिंदू धर्म के लोग मस्जिद गिराने पर अड़े रहते तो वे इसे सहिष्णुता की हमारी महान परंपरा का घोर उल्लंघन मानते। इसे वे राष्ट्रीय चेतना पर ऐसा भद्दा दाग मानते जिसे मिटाना कभी संभव नहीं होता। तब वे उपवास करते और यहां तक कि अपने देश की गरिमा को बचाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ जाते, वही देश जिसे उन्होंने अपनी जान से भी ज्यादा प्यार किया।



-लेखक गांधी फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हैं।

 
 


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