सच तो यह है कि इस तरह के मामले भी सही नहीं हैं, क्योंकि निर्देशक के दृष्टिकोण और शैली पर बहुत कुछ निर्भर करता है। संजय लीला भंसाली ऑपेरानुमा अतिभावुकता वाली फिल्में रचते हैं और बिमल रॉय सिनेमा के वैष्णव कवि थे, अत: दोनों के देवदास जुदा होन ही थे। स्मिता पाटिल ने सत्यजीत रे, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, महेश भट्ट, मृणाल सेन, केतन मेहता जैसे निष्णात निर्देशकों के अलावा व्यावसायिक सिनेमा के बलदेवराज चोपड़ा, मोहन कुमार, प्रकाश मेहरा इत्यादि के साथ भी काम किया। राज बब्बर को स्मिता की तरह अवसर नहीं मिले। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रशिक्षण के दौरान राज बब्बर में असीम संभावनाएं दिखी थीं। वह अपनी पहली फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में नकारात्मक भूमिका में प्रस्तुत हुए थे और व्यावसायिक सिनेमा में इस तरह की शुरुआत के बाद नायक होना ही कठिन होता है, परंतु राज बब्बर को पसंद किया गया। प्रतीक को शायद नहीं मालूम कि राज बब्बर के प्रयासों के कारण ही ‘वारिस’ फिल्म बनी और इस नारीप्रधान फिल्म में केंद्रीय भूमिका स्मिता पाटिल को दी गई, जबकि स्वयं राज बब्बर ने साधारण सी भूमिका की। राज बब्बर ने ही स्मिता पाटिल को उनकी अपनी ‘मदर इंडिया’ प्रदान की। यह तो स्थापित है कि स्मिता पाटिल असाधारण प्रतिभा की धनी थीं और उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कार (‘भूमिका’ के लिए 1978 में व ‘चक्र’ के लिए 1981 में) मिले थे। शिवाजी राव पाटिल जैसे नेता की सुपुत्री होने के कारण वह सत्ता के गलियारों के साथ ही झोपड़-पट्टी में होने वाले समाज कार्य से भी भलीभांति परिचित थीं और साधनहीन लोगों के प्रति उनके मन में करुणा का भाव था। राज बब्बर ने भी छात्र जीवन में ही राजनीति के प्रथम पाठ पढ़ लिए थे और वह सामाजिक अन्याय के प्रति हमेशा संवदेनशील रहे। प्रतीक बब्बर ने अपनी पहली फिल्म में अच्छा अभिनय किया है। यह संभव है कि उन्हें अभिनय विरासत में मिला हो, परंतु क्या वह अपनी माता स्मिता और पिता राज बब्बर की तरह देश और समाज की समस्याओं के प्रति जागरूक और संवेदनशील हैं? अभी तक इस तरह का कोई संकेत उन्होंने नहीं दिया है, परंतु अभी वह युवा हैं। उनके तेवर का तीखापन तो कुछ साक्षात्कारों में उजागर हुआ है। मृत्यु के समय स्मिता पाटिल बब्बर की उम्र मात्र इकतीस वर्ष थी। प्रसव के कुछ समय बाद ही अकस्मात उनकी मत्यु हो गई। उस समय राज बब्बर फिल्म उद्योग के एक आंदोलन के मुख्य कर्ता थे। एक तरह से स्मिता का जीवन किसी महान दलित कवि की अधूरी कविता की तरह रहा और यह दर्द की इंतेहा है। प्रतीक का लालन-पालन उनकी मौसियों ने किया। उन्होंने अपनी मां को मौसियों के माध्यम से जाना है और कुछ परिचय स्मिता की फिल्मों से मिला है। शायद पिता के माध्यम से उन्होंने यह प्रयास ही नहीं किया। मां की आत्मा, जिसे लोकप्रिय ढंग से कोख या बच्चेदानी कहते हैं, में बिताए 9 माह की स्मृति नहीं बनती, परंतु अवचेतन में वह अनुभव अक्षुण्ण है।
आमिर खान की फिल्म ‘जाने तू.. या जाने ना’ में प्रभावोत्पादक चरित्र भूमिका करने वाले नवोदित प्रतीक बब्बर का कहना है कि उनकी माता स्मिता पाटिल उनके पिता राज बब्बर से बेहतर कलाकार थीं। कलाकारों की तुलना उस समय की जाती है, जब वे समान भूमिकाएं करते हैं। मसलन देवदास के रूप में दिलीप कुमार और शाहरुख की तुलना की जा सकती है और इसमें शाहरुख निहायत ही कमतर साबित होते हैं। जैसे वे अमिताभ अभिनीत ‘डॉन’ की रीमेक में भी कमतर ही रहे।