Danik Bhaskar Logo
| 42 Editions | 10 States

Tuesday, October 06, 2009 00:28 [IST]  

danik bhaskarपश्चिम की अंधी नकल

मल्लिका साराभाई

saraअगर कोई आपसे यह सवाल करता है कि यदि आपको दिल्ली से चेन्नई की यात्रा करनी है तो आप इस यात्रा के लिए कौन सा रास्ता चुनना पसंद करेंगे। दो विकल्प हैं, एक है जम्मू होकर चेन्नई जाना और दूसरा है चंडीगढ़ के रास्ते वहां तक का सफर तय करना। इस सवाल के जवाब में आपका उत्तर क्या होगा? अगर कोई व्यक्ति किसी गरीब, निर्धन ग्रामीण से पूछे कि क्या वह ऐसा दूध लेना पसंद करेगा, जिसमें चार प्रतिशत वसा है या कि ऐसा दूध जिसमें तीन प्रतिशत वसा है तो इस पर उसका उत्तर क्या होगा? अगर कोई अपने दोस्त से यह सवाल पूछे कि फर्ज करो कि तुम्हें कैंसर हो जाता है तो तुम कौन से कैंसर को ज्यादा वरीयता दोगे। तुम चाहोगे कि तुम्हें फेफड़ों का कैंसर हो या फिर पेट का कैंसर।


इस सवाल के बदले में उसका उत्तर क्या होगा? कुछ सवाल निहायत ही मूर्खतापूर्ण होते हैं, इसलिए नहीं कि उन सवालों का जवाब बहुत मूर्खतापूर्ण होगा, बल्कि इसलिए कि उन प्रश्नों को पूछने का तरीका ही अपने आप में बहुत गलत और मूर्खतापूर्ण होता है। अभी हाल ही में ‘ग्रीन’ बिल्डिंग समूह और संस्थानों द्वारा एक अवॉर्ड समारोह का आयोजन किया गया। यह अवॉर्ड समारोह अपनी ही पीठ थपथपाने और खुद को ही मुबारकबाद देने जैसा आयोजन था। समारोह यह सिद्ध करने के लिए था कि उनकी इमारतें कितनी हरी और पर्यावरण रक्षक हैं। उस समारोह ने ही मुझे इस तरह के सवालों की याद दिला दी।


इसमें कोई शक नहीं कि भारत पारंपरिक रूप से एक ऐसा समाज है, जहां सबसे ज्यादा रिसाइक्लिंग होता है। जी हां, आज भले ही इस रिसाइक्लिंग की प्रक्रिया गरीबी और निर्धनता के कारण होती है, लेकिन हजारों की संख्या में बनाए गए उन क्राफ्ट और चीजों के बारे में सोचिए, जो इस बुनियादी सोच और रवैए के कारण बनाए गए कि किसी चीज को बर्बाद नहीं होने देना है और मितव्ययता बरतनी है।


बेहत खूबसूरत कशीदाकारी का काम कांथा उनमें से एक है। इसमें बहुत सारे पुराने और बहुत मुलायम हो गए कपड़ों को एक के ऊपर एक जमाकर उसके ऊपर एक नाजुक और मुलायम सा कपड़ा चढ़ाया जाता है। ये छोटे बच्चों के लिए बनाया जाता है। वास्तव में यह पश्चिमी आधुनिकता ही है, जो इस्तेमाल करो और फेंको की संस्कृति हमारे यहां ले आई। आधुनिक जमाने की पैकेजिंग और एक बार में इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद इस इस्तेमाल करो और फेंको वाली संस्कृति के भयानक शिकार हुए। लेकिन बड़ी-बड़ी इमारतों का इस संस्कृति से क्या ताल्लुक है?


1990 की शुरुआत में अमेरिका ने ‘लीड्स’ यानी कि लीडरशिप इन एनर्जी एंड एन्वायरमेंटल डिजाइन की स्थापना की। इसका उद्देश्य इमारतों को इस संबंध में प्रमाणपत्र देना था कि अमुक इमारतें भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए काम कर रही हैं। अमेरिका की इमारतें अत्यधिक ऊर्जा की खपत पर चल रही थीं। साथ ही इस प्रमाण पत्र का उद्देश्य इमारतों को बहुत वृहदाकार नहीं, बल्कि थोड़ा छोटा सोचने के लिए मजबूर करना था। लेकिन अमेरिका पहले से ही एक ऐसा देश है, जो बहुत भारी मात्रा में स्रोतों का आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल कर रहा है। इसलिए बिलकुल लकीर के फकीर की तरह जब हम हिंदुस्तान में ‘लीड्स’ की नकल करते हैं तो क्या हमें बिलकुल उसी तर्ज और उन्हीं मानदंडों पर काम करना चाहिए।


आखिरकार हम उनकी तुलना में बिजली और गैस का बहुत थोड़ा इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में क्या इस संदर्भ में हमें थोड़ा अलग ढंग से नहीं सोचना चाहिए? दो उदाहरण हैं, जिससे यह पता चलता है कि क्यों पश्चिम की नकल करना वास्तव में मूर्खता होगी। ठंडा मौसम और बहुत ज्यादा धुंधला आकाश होने के कारण पश्चिम में अधिकतर इमारतों में बहुत भारी मात्रा में कांच का इस्तेमाल किया जाने लगा। कांच लगाने से भीतर का हिस्सा गर्म रहता है और बहुत सारी रोशनी भीतर आ पाती है। लेकिन भारत का अधिकांश हिस्सा गर्म या बहुत ज्यादा गर्म है। लेकिन फिर भी हम बिलकुल आंख मूंदकर अपने से ‘श्रेष्ठ’ की नकल करते रहते हैं। इसलिए हमारे ढेर सारे वास्तुविज्ञानियों ने भी इमारतों में भारी मात्रा में कांच का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।


उसे ठंडा करने के लिए बड़ी संख्या में एयरकंडीशनर और उसे चलाने के लिए बिजली की जरूरत पड़ी। लीड्स के मानदंडों के हिसाब से अगर किसी इमारत के बाहरी हिस्से में पचास प्रतिशत से कम कांच का इस्तेमाल हुआ है तो उसे ग्रीन बिल्डिंग का खिताब मिल जाता है। लेकिन क्या हमें कांच का इस्तेमाल किए बगैर इमारतें बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए ताकि सर्वप्रथम ऊर्जा की अतिरिक्त खपत को रोका जा सके?


क्या हमें ठंडा करने वाले अन्यान्य तरीकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, जो एयरकंडीशन की तीव्र आवश्यकता का विकल्प हो सकते हैं? (और अब तो हमें हरियाली से ओतप्रोत करने के लिए पर्यावरण के रक्षक कांच आ गए हैं। अगर हमारे वास्तुविज्ञानियों में थोड़ा-बहुत अपराध बोध होगा भी तो ये पर्यावरण रक्षक कांच उसे कम कर देते हैं और लीड्स वास्तुविज्ञानी या लीड्स इमारत के रूप में आधिकारिक मान्यता भी प्रदान कर देते हैं।)

दूसरा उदाहरण: इमारत बनाने में स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल आपको ग्रीन बिल्डिंग का दर्जा दे सकता है। लेकिन इस स्थानीय की क्या परिभाषा है? 50 किमी? 100 किमी? 200 किमी? इस संबंध में स्थानीय की परिभाषा है 500 मील। इसका अर्थ है कि अगर आप नागपुर में इमारत बना रहे हैं तो दिल्ली और हैदराबाद, दोनों ही स्थानीय की श्रेणी में आएंगे और इस तरह आपको ग्रीन होने का दर्जा मिलेगा। लेकिन मुझे लगता है कि जो वास्तुविज्ञानी इटली से कैरेरा मार्बल मंगवाते हैं, उनके लिए यह एक अच्छा परिवर्तन है।

कच्छ की वे इमारतें, जो भूकंप का डटकर सामना कर सकीं और उसके बावजूद बिलकुल अविचल खड़ी रहीं, वे ग्रीन यानि पर्यावरण रक्षक इमारतें हैं। वास्तव में उन्हें ही ग्रीन का दर्जा दिया जाना चाहिए। अगर घरों के निर्माण में पारंपरिक प्लास्टर का इस्तेमाल किया जाए, जो घरों को बिलकुल ठंडा बनाए रखता है तो वह पर्यावरण रक्षक है। अगर आप किसी ऐसे देश में रहते हैं, जहां खूब बांस होता है तो वहां पर इमारतें बनाने में बांस का इस्तेमाल करना ही वास्तव में पर्यावरण रक्षक होना है।


बहुत कम कीमत वाली पवनचक्कियों का इस्तेमाल पर्यावरण रक्षक है। भट्ठी में पकी हुई ईंटों की जगह धूप में सुखाई हुई मिट्टी की ईंटों का इस्तेमाल ज्यादा पर्यावरण रक्षक है। (और यह सुरक्षित भी है। यमन में मिट्टी की ईंटों की बनी हुई इमारत 1000 वर्षो से बनी हुई है और उसे बहुत कम क्षति पहुंची है।) और 1960 और 70 के दशक के बाद से बनी हुई हमारी कंक्रीट की इमारतों को ही देख लीजिए। लेकिन अमेरिकी नियमों के हाथों खेला जाना और प्रमाणपत्र व अवॉर्ड हासिल करना वास्तव में सच्चई को ही मिटा देने से ज्यादा और कुछ नहीं है।


-लेखिका प्रख्यात नृत्यांगना और समाज सेविका हैं।

  share
apne vichaar
post a comment
name:
email:
website:
code:
 
select your language:
Hindi Roman Hindi Phonetic English
comment: