प्राय: देखा गया है कि बहुत अच्छा विद्यार्थी अच्छा शिक्षक नहीं बन पाता। उलझी हुई चीजों को स्पष्ट रूप से इस ढंग से समझाना कि सबसे कमतर विद्यार्थी भी समझ जाए, सरल सा दिखने वाला कठिन काम है। शिक्षक का प्रस्तुतीकरण मौलिक हो सकता है, गोयाकि महान लेखकों की बात को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करना होता है। शिक्षण महान बातों को दोहराना भर नहीं, वरन मौलिक ढंग से प्रस्तुतीकरण है। मेरे शिक्षक अब्दुल हकीम साहब ने एक खूबसूरत लड़की की तस्वीर से बात शुरू करके इटली की आबोहवा, उद्योग, भूगोल और इतिहास पढ़ा दिया, जो आज साठ बरस बाद भी याद है। बहरहाल, अनुपम अपनी निर्माण संस्था की वजह से लंबे कर्जे में आ गए थे और उन्होंने अभिनय प्रशिक्षण संस्थान द्वारा ही कर्ज चुकाए। अत: अनुपम का सारतत्व और सारांश शिक्षक का ही है। यह भी इत्तेफाक ही है कि अनुपम अपनी पहली फिल्म ‘सारांश’ में कमोबेश शिक्षक ही बने, जो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ एकल व्यक्ति जंग लड़ता है। शिक्षक का एक रूप योद्धा का भी है। ‘सारांश’ के समय अनुपम मात्र छब्बीस वर्ष के थे और छियासठ वर्षीय वृद्ध की भूमिका उन्होंने इतनी सजीव प्रस्तुत की कि उन्हें उस वर्ष अभिनय के तमाम पुरस्कार मिले। विगत पच्चीस वर्षो में 300 से अधिक फिल्मों में विविध भूमिकाएं अनुपम ने निभाई हैं और एक लंबा दौर ऐसा भी था जब हर शुक्रवार आप उन्हें देखते थे। इसे उनके अभिनय का संतोषी मां वाला दौर कह सकते हैं। उन्होंने भूमिकाओं की एकरसता से तंग आकर जान्हु बरुआ के निर्देशन में ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ नामक फिल्म का निर्माण किया और केंद्रीय भूमिका ने उन्हें एकरसता से निजात भी दिलाई। एक बेचैन कलाकार इस तरह के आर्थिक जोखिम उठाता है। इसी तरह उन्होंने अपनी पत्नी किरण खेर के लिए एक महान बंगाली फिल्म ‘घरेबाहर’ का निर्माण भी किया था। आज भारत में सबसे अधिक कमाई शिक्षण संस्थान और अस्पताल से हो रही है। क्या चमकीले भारत में रोगियों की संख्या बढ़ गई है? इसी चमकीले भारत में शिक्षा के प्रति भी आग्रह बढ़ा है। आज अच्छे शिक्षकों के अभाव में अनेक संस्थाएं नाम भर के लिए रह गई हैं। आज पच्चीस वर्ष की जद्दोजहद के बाद अनुपम खेर पहले की तरह ही बेचैन हैं और आज भी उनमें पहले की तरह ही अच्छी भूमिकाओं के लिए तड़प है। जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों ने उन्हें बेहतर इंसान और बेहतर कलाकार बना दिया है। अपने एक्टिंग स्कूल में वह विद्यार्थियों में खुद को खोज रहे हैं। वह यह भी जानते हैं कि अभिनय सीखा नहीं जा सकता, परंतु विधिवत पढ़ाया जा सकता है।
अनुपम खेर को मुंबई आए पच्चीस वर्ष हो गए हैं। हाल ही में वह अमेरिकी फिल्मकार वुडी एलन की फिल्म में चरित्र भूमिका का निर्वाह करके लौटे हैं। लौटने के बाद वे खेखाड़ी नामक झोपड़-पट्टी भी गए, जहां अपने संघर्षकाल में उन्होंने पांच रुपए प्रतिमाह की दर से छोटे बच्चों को पढ़ाया था। खफीफ सी आय में अनुपम बमुश्किल दो वक्त दाल-चावल ही खा पाते थे और प्रतिदिन पैदल पृथ्वी थिएटर्स जुहू जाते थे। अनुपम ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली में चार वर्ष तक अभिनय का प्रशिक्षण लिया और मुंबई आने से पहले चंडीगढ़ में टीचर भी रहे।