जोधपुर. समाज में बेटी शान के साथ आएगी, इसके लिए हम व्यापक प्रचार-प्रसार करेंगे। इसी संकल्प के साथ मंगलवार को होटल घूमर में लिंग निर्धारण एवं लैगिंक भेदभाव मिटाने संबंधित कार्यशाला संपन्न हुई। दूसरे दिन कार्यशाला में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा कि आज का पढ़ा लिखा तबका भले ही सार्वजनिक रूप से बेटा-बेटी एक समान होने की बातें करे, लेकिन वास्तविकता इससे बहुत भिन्न है।
अभी भी वंश वृद्धि, उत्तराधिकार, समाजिक असुरक्षा, बुढ़ापे का सहारा, दहेज समस्या, पराया धन मानकर लैंगिक जांच को प्राथमिकता दी जा रही है। आंकड़ों के हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में बाल लिंगानुपात तेजी से घटा है। राजस्थान में 1000 पुरुषों पर 927 महिलाएं है। वहीं 10 जिले ऐसे भी है जहां महिलाएं 900 के आंकड़ों से भी नीचे हैं।
राजस्थान में छह वर्ष के बच्चों के मामले में तो स्थिति यह है कि 1000 बालकों पर मात्र 909 बालिकाएं हैं। कार्यशाला में विभिन्न यूर्निवसिटी और कॉलेज के लगभग 40 व्याख्याताओं ने भाग लिया। कार्यशाला राजस्थान यूनिवर्सिटी वुमन एसोसिएशन (रूवा), युनाइटेड नेशन्स पोपुलेशन फंड की ओर से अनुदानित व जेएनवीयू के महिला अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई थी।
कार्यशाला के प्रथम सत्र में सामाजिक, आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए मीडिया की भूमिका पर प्रवक्ता डॉ. संगीता चतुर्वेदी ने चर्चा की। दूसरे सत्र में ‘उसका आना’ डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गई जिसमें एक लड़की की व्यथा को स्पष्ट किया गया है। तीसरे सत्र में प्रोफेसर लाडकंवर जैन ने लीगल अवेयरनेस और पीसीपीएनडीटी एक्ट के बारे में जानकारी दी।
डॉ. अजीत कुमार ने चौथे सत्र में सहभागी कार्यकर्ताओं की भूमिका के बारे में जानकारी दी। संचालन डॉ. कै लाश कौशल ने किया। कार्यशाला के अंत में सभी प्रतिभागियों को सर्टिफिकेट भी दिए गए।