पहली-पहली पहेली..
उन खानों में उसने अंग्रेज़ी के अक्षर लिख दिए। आर्थर ने इन सभी 72 खानों को आड़े और खड़े रूप में इस तरह से व्यवस्थित करना शुरू किया कि उन खानों में रखे अक्षरों को मिलाकर एक शब्द तैयार हो और उस शब्द का कोई खास मतलब निकले। अब आर्थर ने इन सारे खानों में लिखे अक्षर हटा दिए और जो शब्द जिस खाने से शुरू व खत्म हो रहा था, वहां-वहां कुछ अंक रख दिए।
इसके बाद आर्थर ने उस पहेली के बाहर की तरफ उन शब्दों से जुड़ी जानकारियां लिख दीं। ये जानकारियां संकेतों के रूप में थीं। पहेली हल करने वाले पाठक को संकेतों की मदद से ऐसा शब्द सोचना था, जिसके अक्षर दो अंकों के बीच में स्थित खानों में ठीक तरह से लिखे जा सकें। लेकिन यहां पर ज़रूरी था कि शब्द वही हों, जो आर्थर ने सोच रखे थे वरना पहेली गड़बड़ा जाती।
आर्थर ने अपनी इस पहेली को ‘वर्ड क्रॉस पज़ल’ नाम दिया, जिसे अब सारी दुनिया ‘क्रॉसवर्ड पज़ल’ के नाम से जानती है। इस पहेली में शब्दों को वर्गाकार डिब्बे के खानों में भरा जाता है, इसलिए हिंदी में इसे ’वर्ग पहेली’ कहा जाता है। आर्थर वाइन की ये वर्ग पहेली 21 दिसंबर 1913 को ‘न्यूयॉर्क वर्ल्ड’ के रविवारीय परिशिष्ट ‘फन’ में प्रकाशित हुई और जल्दी ही पाठकों में काफी लोकप्रिय हो गई।
वर्ग पहेलियों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए कोलम्बिया विश्वविद्यालय से पढ़े लिंकन श्युस्टर और रिचर्ड साइमन ने इन पर एक किताब प्रकाशित की। यह किताब अमेरिका में उस साल की ‘बेस्ट सेलर’ यानी सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब साबित हुई। इसके बाद साइमन और श्युस्टर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
आज साइमन और श्युस्टर अमेरिका के सबसे बड़े प्रकाशक हैं। हालांकि पाठकों को तो ये चीज़ बहुत पसंद आई, लेकिन दूसरे समाचार पत्रों ने इसकी बहुत खिल्ली उड़ाई। एक अख़बार ने अपने एक अंक में लिखा कि वर्ग पहेली एक पागलपन का खेल है। रोज़ाना करीब पचास लोग अपना समय इस फालतू चीज़ में गंवाते हैं।
लेकिन इन सब बातों का वर्ग पहेली की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ा। वर्ग पहेलियों की लोकप्रियता का आलम ये था कि 1924 में शिकागो की एक महिला ने अपने पति के ख़िलाफ अदालत में तलाक की अर्जी दायर कर दी क्योंकि उसका पति वर्ग पहेलियों को हल करने में इतना ज्यादा व्यस्त रहता था कि वह अपने काम और पत्नी को समय ही नहीं दे पाता था।
जज ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आगे से वह व्यक्ति एक दिन में सिर्फ तीन ही पहेलियां हल कर सकता है,जिससे कि वह अपने घरेलू कामों पर भी ठीक से ध्यान दे सके। ऐसा ही एक वाकया तब पेश आया, जब एक आदमी ने हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में आत्महत्या कर ली और उसने अपने पीछे छोड़े गए पत्र को वर्ग पहेली के रूप में लिखा।
उस वर्ग पहेली को कभी कोई हल नहीं कर सका। वर्ग पहेली इंग्लैंड में भी बहुत लोकप्रिय हुई। उस समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री भी वर्ग पहेलियों के शौकीन थे। लेकिन ये सब शुरूआती दौर की बातें हैं,जब वर्ग पहेलियां अमेरिका और इंग्लैंड में ही प्रचलित थीं। धीरे-धीरे दुनिया के बहुत सारे देशों में वर्ग पहेलियों का प्रचलन हो गया। आज हमारे देश में भी वर्ग पहेलियां खूब हल की जाती हैं।
आपको वर्ग पहेली की यह कहानी पढ़कर मज़ा आया होगा! आपको एक बात और बताएं। शुरू में वर्ग पहेली का विरोध करने वाले अमेरिका में ऐसा भी दौर आया, जब लोग किसी अख़बार या मैगजीन को उसके क्रॉसवर्ड के कारण खरीदते थे और क्रॉसवर्ड का पन्ना निकालकर बाकी अख़बार को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया करते थे।










