यह कलियुग नहीं विज्ञापन युग है
जयप्रकाश चौकसे Friday, October 09, 2009 00:51 [IST]  

Aamir Khanवस्तुएं कारखानों में बनती हैं, परंतु ब्रांड दिमाग में तैयार किए जाते हैं - वॉल्टर लेंडोर के इस कथन का जिक्र विद्योत्तमा शर्मा ने अपने सारगर्भित लेख में किया है। बाजार और विज्ञापन की ताकतें आम आदमी की विचार प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। सड़क पर होर्डिग्स लगे होते हैं, अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित होते हैं और टेलीविजन पर विज्ञापन फिल्मों का निरंतर प्रसारण जारी रहता है यानी आपके जीवन और सोच में हरसंभव तरीके से घुसपैठ जारी रहती है। आप धूल, गर्मी और बरसात से तो बच सकते हैं, परंतु विज्ञापन से बचना अब संभव नहीं है।

इसके जरिए मनुष्य के अवचेतन में बात बैठा दी जाती है। यह काम इतनी चतुराई से हो रहा है कि आपको पता ही नहीं चलता कि डाका पड़ चुका है। दसों दिशाओं से बात इतनी बार दोहराई जाती है कि अवचेतन में गूंजती रहती है। आज किसी भी वस्तु के निर्माण व्यय से कई गुना अधिक धन उसके विज्ञापन पर लगाया जाता है। अगर विज्ञापन व्यय हटा दें तो अपना मुनाफा कायम रखते हुए भी अवाम को चीजें सस्ते में मिल सकती हैं। आज के दौर में विज्ञापन इतनी बड़ी शक्ति बन चुका है कि अगर उसका मुर्गा बांग नहीं दे तो शायद सूरज भी न उगे। यह सोचकर दिल दहल जाता है कि दो-चार सौ वर्ष बाद अगर हमारे युग का आकलन केवल विज्ञापन फिल्मों के आधार पर हो तो हमारी क्या छवि बनेगी?

कारपोरेट घराने सितारों को ब्रांड एंबेसडर के रूप में एक या तीन वर्ष के लिए अनुबंधित करते हैं, जिसके तहत उनके लिए विज्ञापन फिल्मों में काम करने के साथ ही उनके द्वारा आयोजित समारोहों में भी सितारे जाते हैं। अनुबंध राशि एक से दस करोड़ रुपए के बीच तय होती है। इतना धन देने का एक कारण यह है कि उनके द्वारा आयोजित समारोह को कवर करने मीडिया मुफ्त में पहुंच जाता है। सितारे की इसी ताकत के कारण अमीर लोग उसे धन देकर परिवार के विवाह में भी आमंत्रित करते हैं।

एक अहम बात यह है कि कारपोरेट घराने अपनी ओर से प्रयास करते हैं कि उनके सितारों को अभिनय का पुरस्कार मिले या उन्हें अत्यंत गरिमापूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयोजन में आमंत्रित किया जाए। इसी तरह के कुछ कार्यक्रमों में भारतीय सितारों की मौजूदगी का रहस्य यही है। विज्ञापन कंपनी की सृजन टीम बहुत सोच-विचार करके ही सितारे की छवि के अनुरूप विज्ञापन फिल्म गढ़ती है। मसलन एक विज्ञापन में सैफ कहते हैं कि मैं तुम्हें (करीना) इतना प्यार करता हूं कि दर्द होने लगता है। रिश्तों का दोहन निर्मम रूप से किया जाता है। आमिर खान की विज्ञापन फिल्में मौलिक चतुराई से गढ़ी गई हैं। आजकल लोकप्रिय जोड़ियों का इस्तेमाल होता है जैसे ऐश्वर्या-अभिषेक, सैफ-करीना, जॉन-बिपाशा और रणबीर-दीपिका।

अक्षय कुमार की छवि एक्शन हीरो की है तो एक शीतल पेय की विज्ञापन फिल्मों में एक्शन दृश्य रखे गए हैं। शाहरुख खान के साथ अनुबंध के बावजूद एक शीतल पेय में रणबीर कपूर और दीपिका को अनुबंधित किया, क्योंकि युवा वर्ग उन्हें पसंद करता है। इसी तरह ‘नक्षत्र’ ने ऐश्वर्या राय की जगह कैटरीना कैफ को अनुबंधित किया। रानी मुखर्जी की फिल्में असफल होते ही उनकी जगह जेनेलिया डिसूजा को लिया गया।

सबसे बड़ी बात यह है कि अनुबंध की एक शर्त यह भी होती है कि सितारे को विज्ञापित वस्तु की छवि के अनुरूप सामाजिक आचरण करना होगा। बाजार और विज्ञापन शक्तियों के फैलते दायरों मंे अन्य मूल्य सिमटते जा रहे हैं। हमारे अवचेतन पर कौन शासन कर रहा है? आम आदमी को पता ही नहीं है कि उसकी पसंद-नापसंद पर शासन करने वाली शक्तियां कब उसकी आत्मा को कैद कर लेंगी।

 
 


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