तथाकथित फॉमरूला फिल्म के आदि गुरु शशधर मुखर्जी ने अपनी सबसे महत्वाकांक्षी फिल्म दिलीप कुमार अभिनीत ‘लीडर’ में सारे टोटके डाले, परंतु फिल्म नहीं चली। राज कपूर की लगभग सारी फिल्मों में ‘जोकर’ की मूल अवधारणा कुछ दृश्यों में मौजूद है, परंतु जब उन्होंने उसे एक मुकम्मल फिल्म में कहने की कोशिश की, तो असफल हो गए। दक्षिण के एलवी प्रसाद को सौ से अधिक फिल्में बनाने का अनुभव है और उनकी जितेंद्र अभिनीत ‘जय विजय’ असफल हो गई। उन्होंने दोबारा कई दिन की शूटिंग करके उसे पुन: प्रदर्शित किया, फिर भी असफलता हाथ लगी। राम गोपाल वर्मा ने अपनी सफल फिल्म ‘शिवा’ को दो बार बनाया, परंतु सफलता नहीं मिली। इस माध्यम के साथ बच्चों की तरह जिद नहीं की जा सकती। फिल्म का समग्र प्रभाव थोड़े से परिवर्तन के कारण भी बदल जाता है। यह खेल विचित्र है। सूरज बड़जात्या ने ‘मैंने प्यार किया’ की सफलता के बाद पिता के आग्रह पर उनकी ‘नदिया के पार’, जो केवल बिहार और उत्तर प्रदेश में ही सफल हुई थी, को ‘हम आपके हैं कौन’ के नाम से बनाया और वह सफलतम सिद्ध हुई। उसके रिकॉर्ड को ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ भी नहीं तोड़ पाई। सूरज ने अपने पिता की ‘चितचोर’ को ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ के नाम से बड़े स्केल पर बनाया, परंतु फिल्म असफल रही। ‘चितचोर’ में अमोल पालेकर और विजयेंद्र घाटगे थे, परंतु नए संस्करण में ऋतिक रोशन और अभिषेक बच्चन के साथ करीना कपूर थीं। 1927 में ‘साहूकारी पाश’ की सफलता के बाद एक निर्माता ने महान लेखक सआदत हसन मंटो से ‘किसान कन्या’ लिखवाई, परंतु यह फिल्म नहीं चली। ग्रामीण भारत में महाजनी अत्याचार के विचार पर ही मेहबूब खान ने 1940 में ‘औरत’ बनाई और इसी पटकथा पर 1957 में ‘मदर इंडिया’ बनाई, जिसने सफलता के कीर्तिमान स्थापित किए। यह भी एक अजूबा है कि महाजन की भूमिका कन्हैया लाल ने सत्रह वर्ष बाद भी एकसी सफलता से निभाई। बलदेव राज चोपड़ा ने आईएस जौहर की पटकथा पर अशोक कुमार अभिनीत सफल ‘अफसाना’ बनाई और इसी पटकथा पर आठवें दशक में दिलीप कुमार अभिनीत ‘दास्तान’ बनाई, जो असफल रही। इस पूरे खेल में फिल्मकार यह भूल जाता है कि दर्शक बदल जाते हैं और उनकी रुचियां भी बदल जाती हैं। सामाजिक सरोकारों का संदर्भ भी बदल जाता है। फिल्मकार बुढ़ा जाता है, पर दर्शक जवान रहता है। साथ ही यह भी सच है कि कोई भी फिल्मकार अपनी ही रचना के अन्य संस्करणों में समान समग्र प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाता। एक-दो दशक पहले देखी हुई फिल्म को कुछ वर्ष पश्चात देखता है, तो उसकी प्रतिक्रिया में अंतर आ जाता है। पांचवे दशक में धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ को सिसकते हुए पढ़ने वाले दर्शक बाद में शर्मसार थे और लेखक को भी शायद अफसोस था। टीएस इलियट ने 1916 में शोधग्रंथ प्रस्तुत किया, परंतु वे उपाधि लेने नहीं गए और बाद में उसके प्रकाशित संस्करण को भी अस्वीकृत कर दिया। केवल सर्वकालिक रचनाओं को हर कालखंड में सराहा जा सकता है।
केदार शर्मा ने आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ पर श्वेत-श्याम सफल फिल्म बनाई और दो दशक बाद उसी पटकथा पर तत्कालीन सुपर सितारे अशोक कुमार और मीना कुमारी को लेकर रंगीन संस्करण बनाया, जो असफल हो गया। यह एक भ्रम है कि सफलता का फॉमरूला होता है और वह दोहराया जा सकता है। विज्ञान द्वारा सिद्ध फॉमरूला हमेशा दोहराया जा सकता है, इसीलिए उसे सिद्धांत कहते हैं।