मौत रहस्य है। ज़िंदगी उससे भी गहरा रहस्य। कलाकार के रहस्य को कोई जान ही नहीं सकता। इसी तरह के रहस्य को अपनी फ़िल्मों में क़ायम रखने वाले और अपनी ज़िंदगी के रहस्य में खो जाने वाले गुरुदत्त आज तक हमारी स्मृतियों में बसे हुए हैं। आज उन्हें याद करके हम धन्य हो रहे हैं..
मैसूर में 9 जुलाई 1925 को एक मुख्याध्यापक के घर पहला बच्च पैदा हुआ। इसका नाम रखा गया, वसन्थ कुमार पादुकोने। परंतु बचपन में एक दुर्घटना होने के कारण उसका नाम बदला गया और नया नाम रखा गया, गुरुदत्त। यही वह नाम था, जिसने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा, एक नई राह दी।
गुरुदत्त की प्रारंभिक शिक्षा कलकत्ता में हुई, इसलिए बंगाली भाषा से वह अच्छी तरह परिचित हुए। फिर उन्होंने देश के प्रसिद्ध नृत्य निर्देशक, उदय शंकर से नृत्य सीखा। फिर वे प्रभात स्टूडियो, पूना आ गए और फ़िल्म ‘हम एक हैं’ (1946) में बतौर नृत्य निर्देशक काम किया। प्रभात स्टूडियो में रहते उनकी मुलाक़ात देवानंद से हुई। कहा जाता है कि देवानंद और गुरुदत्त की एक ही रंग की कमीज़ों को धोबी ने बदल दिया। देवानंद की कमीज़ गुरुदत्त के पास और गुरुदत्त की कमीज़ देवानंद के पास आ गई।
फिर यहीं से वे पक्के दोस्त बन गए और फ़िल्म इंडस्ट्री में एक-दूसरे का साथ देने के वायदे हो गए। यह वायदा उस व़क्त पूरा हुआ, जब देवानंद ने अपने बैनर ‘नवकेतन’ की स्थापना की और अपने बैनर की पहली फ़िल्म ‘बाज़ी’ (1951) का निर्देशन गुरुदत्त को सौंपा। देवानंद, गीता बाली और कल्पना कार्तिक अभिनीत यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट साबित हुई।
‘बाज़ी’ फ़िल्म के गानों की साउंड रिकॉर्डिग के समय गुरुदत्त की मलाक़ात उस समय की प्रसिद्ध गायिका गीता राय से हुई। मुलाक़ात प्यार में बदली और 26 मई 1953 को गुरुदत्त और गीता राय की शादी हो गई।
फ़िल्म ‘आर-पार’ के लिए गुरुदत्त ने अबरार अल्वी को डायलॉग लिखने के लिए अनुबंधित किया। इसके बाद अल्वी और गुरुदत्त की ऐसी जोड़ी बनी, जिन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में इतिहास रच दिया। गुरुदत्त के आरक रॉयल, पैडर रोड वाले फ्लैट पर शाम को गुरुदत्त और अल्वी व्हिस्की के पैग लगाते और रचनात्मक पटकथा, रचनात्मक सीन और रचनात्मक संवादों का जन्म होता।
अबरार अल्वी के कुछ कॉलेज के मित्र जब हैदराबाद से मुंबई आए, तो अल्वी अचानक एक कोठेवाली से मिले। उसका नाम गुलाबो था। अल्वी ने कोठेवाली के जीवन दिखाने के लिए गुलाबो को ‘प्यासा’ में जन्म दिया, जो हीरो, कवि की पुस्तक प्रकाशित करने के लिए तत्पर है। साड़ी पहन कर, सिर पर पल्लू रख कर, वहीदा रहमान ने यह रोल बेहतरीन तरीक़े से किया।
वहीदा रहमान से गुरुदत्त की मुलाक़ात एक हादसा थी। अल्वी कहते हैं कि वहीदा रहमान को उस बैलगाड़ी का धन्यवादी होना चाहिए, जिसकी वजह से गुरुदत्त वहीदा से मिले। गुरुदत्त को दक्षिण के एक डिस्ट्रीब्यूटर ने फोन किया कि दक्षिण की एक फ़िल्म ‘मिस्सीयामा’ बहुत चल रही है। आप इसे देखें और इसका हिंदी रीमेक बनाएं। अल्वी और गुरुदत्त अपने प्लेमाउथ गाड़ी में फ़िल्म देखने हैदराबाद के लिए रवाना हुए। फ़िल्म देख कर उन्हें उसी दिन वापिस आना था, पर हैदराबाद के पास एक बैलगाड़ी से कार की टक्कर हो जाने के कारण गाड़ी को वर्कशॉप भेजना पड़ा। गाड़ी को ठीक होने में तीन दिन लग गए। इन्ही तीन दिनों में उनकी मुलाक़ात वहीदा रहमान से हुई, जो दक्षिण की एक फ़िल्म ‘रोजुलू मरेई’ में एक छोटे से डांस में आई थी। बाद में गुरुदत्त ने उन्हें मुंबई बुला लिया और फ़िल्मों के विभिन्न किरदारों में ढाल कर वहीदा को जीवंत बना दिया।
बदरूद्दीन को जॉनी वॉकर नाम देकर फ़िल्मों में लाने वाले गुरुदत्त ही थे। गुरुदत्त को कलकत्ता के गोल-गप्पे और मसाले वाले चावल बहुत अच्छे लगते थे। अबरार और गुरुदत्त प्यासा की लोकेशन सर्वे के लिए कलकत्ता गए हुए थे और फुचकास और झलमुरी विक्टोरिया मैमोरियल के मैदान में बैठ कर खा रहे थे। तभी गुरुदत्त ने एक मालिश वाले को देखा, जो मैदान में घूम रहा था। चैक लूंगी, बनियान, टोपी पहने और हाथ में अलग अलग तेलों की शीशियां लिए कह रहा था, ‘मालिश करवा लो।’ इसी को देखकर गुरुदत्त ने मालिश वाले के किरदार सूझा और प्यासा में यह रोल जॉनी वॉकर को देकर जीवंत कर दिया। गीत ‘सर जो तेरा चकराए’ सब की ज़ुबान पर था और आज भी है।
प्यासा की शूटिंग चल रही थी। अबरार को, जिन्हें गुरुदत्त का आदेश था कि वह हमेशा शूटिंग पर उपस्थित रहेंगे, एक छोटे से ऑपरेशन के लिए कुछ दिनों के लिए अस्पताल जाना पड़ा। गुरुदत्त ने इस बीच साहिर लुधियानवी का लिखा गीत रफ़ी की आवाज़ में रिकॉर्ड भी कर लिया और शूट भी कर लिया। गीत था, ‘यह महलों, यह तख़्तों, यह ताजों की दुनिया’। जब अबरार अस्पताल से शूटिंग में आए, तो गुरुदत्त ने उन्हें गाने के रसेस दिखाए। अल्वी ने गुरुदत्त से कहा, हमारा देश 1947 में आज़ाद हो चुका है,। यह एक प्रजातांत्रिक देश है। महलों, राजों-महाराजों, त़ख्तों-ताजों का समय ख़त्म हो चुका है। तुम गाने में कौन से महलों, त़ख्तों-ताज़ों की दुनिया की बात कर रहे हो। गुरुदत्त हैरान हो गए। कुछ भी नहीं किया जा सकता था।
न गाना दोबारा रिकॉर्ड हो सकता था, न शूटिंग हो सकती थी। बहुत पैसा लगा हुआ था। अगले दिन अबरार नई सोच के साथ आए और उसी सीक्वैंस के लिए ये संवाद रहमान को दिए-आज हम इतने बड़े लेखक की बरसी मना रहे हैं, अगर आज वह ज़िंदा होते, तो हम उन्हें त़ख्त पर बिठाते। उनके सिर पर ताज रखते। तभी जिंदा विजय गाना शुरू करते हैं, ‘यह महलों, यह त़ख्तों, यह ताजों की दुनिया।’ इस तरह बिगड़ी हुई बात को अल्वी की विद्वान सोच ने सही बना दिया और पैसा भी ख़राब नहीं हुआ।
9-10 अक्तूबर 1964 की रात में अधिक व्हिस्की और नींद की गोलियां खाने से महान फ़िल्मकार गुरुदत्त हमसे हमेशा-हमेशा के लिए बिछुड़ गए। उनकी मौत का रहस्य आज भी बना हुआ है। उनकी मौत से गीता दत्त को बहुत सदमा लगा और वह भी व्हिस्की पीने की शिकार हो गईं। 1972 में लीवर सिरौसिज़ की वजह से वे स्वर्गवास हो गईं। एक महान फ़िल्मकार, जिसने सैल्यूलायड स्क्रीन को महान क्लासिक कृतियां दीं, सदा के लिए सो गया। अन्यथा न जाने कितनी ‘कागज़ के फूल’, ‘प्यासा’ और ‘साहिब, बीवी और ग़ुलाम’ जैसी फ़िल्में बॉलीवुड की आरकाईव में होतीं।
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