जोधपुर. जब भी मैं उसे देखता हूं तो मुझे भी अपने उस बिंदास बचपन की याद आती है और उसको पढ़ाई के लिए टेंशन करते देख अपनी लापरवाही पर हंसी आती है। जब मैं 5और 6 वर्ष की थी तो दिन भर बाहर ही खेलती थी।
अब यह पोती है जो पलंग से नीचे उतरते हुए डरती है और जमीन पर पैर रखने से पहले पेरेंट्स हुक्म का पालना करने के लिए उपस्थित हो जाते हैं। जब यह6 वर्ष की उम्र में टीवी विडियो गेम और इंटरनेट का मजा लेता है तो मुझे अपने पतंग उड़ाने और गिल्ली डंडा खेलने के वो दिन याद आ जाते है..अब सब कितना बदल गया है और यह बदलाव की दौड़ पता नही कहां जाकर रुकेगी..।
ऐसे विचार सभी बच्चों के दादा दादी और नाना नानी के मुंह से तब सुनने को मिले जब वो अपने पोते-पोती और नाती-नातिन के साथ स्कूल के कार्यक्रम में आए और अपने बच्चों द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बच्चों की भागीदारी को देखकर उन्हें भी उस गुजरे जमाने की याद आ गई।