नवासी वर्षीय प्राण साहब अपनी उम्र से ज्यादा के लगते हैं और देव आनंद की उम्र से जंग अब दयनीय लगने लगी है, परंतु छियासी के दिलीप साहब आज भी सुर्ख हैं और लगता है गाल छूने पर खून रिसने लगेगा। यह भी इत्तेफाक ही है कि ये तीनों पेशावर के आसपास ही पैदा हुए थे। दिलीप और राज कपूर तो एक ही गली में जन्मे थे। क्या इन तीनों को आज आतंकवाद की गिरफ्त में फंसे अपने जन्मस्थान की दुर्दशा कचोटती होगी? दिलीप साहब और प्राण ने बहुत सी फिल्में साथ-साथ की हैं और प्राण ने देव आनंद के साथ भी काम किया है। दिलीप साहब और देव आनंद ने दक्षिण में बनी ‘इंसानियत’ फिल्म में साथ काम किया है। बहरहाल जब ये तीनों जवान थे, तब भी इनके बीच गहरा आपसी भाईचारा था और पास-पड़ोस में ही रहते थे। आज के खान सितारे पास-पड़ोस में ही रहते हैं, परंतु मेल-मुलाकात नहीं है। वक्त के इन जुदा दौरों में व्यवसायी कलाकारों के जीवन मूल्यों का अंतर देखते हैं। उस जमाने में कम फिल्में बनती थीं और कलाकार भी सोच-समझकर फिल्में कुबूल करते थे। दिलीप साहब ने साठ साल के कॅरियर में बमुश्किल 70 फिल्में अभिनीत की हैं। उस समय काम भरपूर मजे लेकर किया जाता था। ‘कोहिनूर’ में सितार बजाने के दृश्य के लिए दिलीप साहब ने बाकायदा तीन महीने रियाज किया था। आज के दौर में सितारों को बेहिसाब धन मिलता है और उन्हें जल्दी-जल्दी काम करना होता है, क्योंकि विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग और बतौर ब्रांड एंबेसडर कई आयोजनों में हिस्सा लेना होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये सब अपनी व्यावसायिक अहमियत और बाजार मूल्य से परिचित हैं और हर पल के प्रति जरूरत से ज्यादा सचेत हैं। कोई काम यूं ही स्वत:स्फूर्त करना उनके लिए कठिन है। किसी से हाथ मिलाते हुए भी वे सजग हैं कि स्पर्श से उनके हाथ का मैल कोई खींच न ले। वह दौर और था, जब लोग धन को हाथ का मैल समझते थे। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि मौजूदा सितारे अच्छे इंसान नहीं हैं या पुरानी पीढ़ी निष्पाप थी। कई कारणों से दृष्टिकोण बदला है। पहले राष्ट्रीय अखबार प्रति इतवार सिनेमा को बमुश्किल एक पेज देते थे और आज प्रतिदिन कम से कम एक पेज देते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सितारों को अपनी अहमियत से परिचित कराया है और बाजार की ताकतों ने उन्हें ब्रांड ही नहीं, वरन बिकाऊ चीज बना दिया है। वे जान गए हैं कि शादी में शिरकत करने से मेजबान का सामाजिक मूल्य बढ़ेगा। वे दुकान का उद्घाटन करने जाते हैं तो दुकान को मीडिया पर खर्च नहीं करना पड़ता। हमारी दूषित व्यवस्था ने कुछ लोगों को रातोंरात करोड़पति बना दिया है और ये सितारों की धूल के तलबगार हैं। सितारे के जागते रहने का हर पल उपजाऊ है। केवल नींद के घंटों में वह कुछ नहीं कमाता, परंतु निर्माता सपने बेचता है। सच तो यह है कि जब सितारा सोता है, तब भी उसके द्वारा अन्य व्यवसाय में लगाया धन बढ़ता रहता है। सितारा जानता है कि वह टकसाल हो गया है। यह बाजार की ताकतों का कमाल है कि आम आदमी खुद रुपए की तरह बाजार में खर्च हो रहा है, गोयाकि बाजार की ताकतें किसी को भी सामान्य नहीं रहने देतीं।
छियासी से नवासी के आयु समूह के दिलीप कुमार, देव आनंद, और प्राण सिकंद मुंबई में पाली हिल पर एक फर्लाग के क्षेत्र में रहते हैं। शाहरुख खान, आमिर और सलमान खान भी निकट ही बैंड स्टैंड पर एक फर्लाग के क्षेत्र में रहते हैं, परंतु इनके मन की दूरियां काफी बड़ी हैं। बुजुर्ग कलाकार यादों की डोर से बंधे हैं। यह खुशी की बात है कि दिलीप साहब की आती-जाती याददाश्त में खूब सुधार आया है, जैसा कि हाल ही में ईद के अवसर पर नजर आया। जवानी में यादें बोई जाती हैं, बुढ़ापे में फसल लहलहाती है और बचपन की यादें उन जंगली पौधों की तरह हैं, जो अपने आप ही उग आते हैं। यादें घुसपैठिया होती हैं, आतताई भी होती हैं और संजीवनी की तरह मन के वीराने में लहलहाती हैं। यह असफल प्रेमी को जिबह भी करती हैं।