उदयपुर. लोहिया नाम आते ही एक बारगी ख्याल आता कि वो शायद लोहे जैसा इन्सान होगा।
हर तरह की ग़ैर-बराबरी के खिलाफ सतत संघर्ष, औरतों को मर्दो के बराबर या उनसे भी ज़्यादा अधिकार, समाजवादी समाज का निर्माण, हिन्द-पाक एका और छोटे किसानों के हक़ की Êिाद लिये डॉ. राममनोहर लोहिया को सिर्फ मौत ही खामोश कर सकी थी। उदयपुर की हबीबा बानू तहसीन 1963 से ही डॉ. लोहिया के आंदोलनों में शरीक हो गईं थीं। वे सितम्बर—-अक्तूबर, 1967 में लोहिया के आखिरी वक्त में भी उनके साथ थीं।
समाजवादी आन्दोलन की बात
सितम्बर 1967 में लोहिया ने बिहार में जयप्रकाश नारायण (जे.पी.) से मुलाकात की। भूदान आंदोलन में लगे जेपी से लोहिया ने कहा कि जयप्रकाश फिर से सक्रिय राजनीति में आयें तो वे उनका नेतृत्व स्वीकार करेंगे। लोहिया का तर्क था कि हमारे देश का जनमानस उसी को नेता स्वीकार करता है, जो शादीशुदा हो, जिसका अपना परिवार व घर हो और जिसकी अपनी सम्पत्ति हो।
लोहिया ने कहा कि उनके पास तीनों ही नहीं हैं और जेपी के पास हैं। जेपी भावुक हैं, जनता के दर्द को समझते हैं और जनता उनसे प्यार करती है। इस चर्चा के बाद लोहिया दिल्ली चले गए, जहां उनका प्रोस्टेट का इलाज होना था।
हिन्द-पाक एका
दिल्ली पहुँचकर डॉ. लोहिया ने राजनारायणजी को काबुल भेजा। राजनारायण जी को ‘सीमान्त गाँधी’ ख़्ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़्ान से मिलकर उन्हें भारत आने के लिये राÊाी करना था। मक़सद था हिंद-—पाक महासंघ।
डॉ. लोहिया हिन्द-—पाक एका समिति बना चुके थे, जिसके अध्यक्ष जस्टिस हैदर हुसैन, महामन्त्री डॉ. फ़रीदी, मन्त्री राजनारायण और संयोजक हबीबा बानू तहसीन थीं। वे चाहते थे कि भारत-पाक के बीच एक ढीला—ढाला महासंघ बनाकर शुरुआत की जाये।
इसका मक़सद देशों का विलय नहीं, बल्कि आपसी विश्वास को बनाना और क़ायम रखना था। राजनारायण जी काबुल में बादशाह ख़्ान से मिले भी, लेकिन आनन-—फानन में डॉ. लोहिया के ऑपरेशन और उनकी बिगड़ती तबियत के कारण वार्ता बीच में ही छोड़कर लौट आये।
‘सवा छह एकड़ पर लगान माफ़ किया कि नहीं?’
दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में प्रोस्टेट के ऑपरेशन के दौरान डॉ. लोहिया की आंतों को इस तरह काटा और सिला गया कि पेट अंदर ही सड़ने लगा। Êाहर सारे बदन में फैल रहा था और वे बार-बार बेहोश हो रहे थे। राजनारायण काबुल से लौट आये थे। लोहिया जब-—जब होश में आते तो उनका एक ही सवाल होता, ‘राजनारायण! चौधरी ने सवा छह एकड़ पर लगान माफ़ किया या नहीं?’
पहली बार 1967 में देश के नौ राज्यों में, डॉ. लोहिया की ग़ैर-कांग्रेसवाद की रणनीति से, संयुक्त विधायक दल (संविद) की सरकारें बनीं थीं। लोहिया ने कहा था कि जिन किसानों की जोत सवा छह एकड़ या उससे कम है, उनसे लगान नहीं लिया जायेगा। ऐसे छोटी जोत के किसान अपने घर के लिये ही फसल मुश्किल से पाते हैं। उत्तर प्रदेश में चौधरी चरणसिंह को मुख्यमन्त्री बनाया गया था।
डॉ. लोहिया की हालत देखकर राजनारायण ने कह दिया कि लगान माफ कर दिया है। लोहिया बिगड़ गए, ‘झूठ बोलते हो तुम! चौधरी ख़्ाुद आकर क्यों नहीं कहते?’ लेकिन जिस शख़्स ने चौधरी साहब को मुख्यमन्त्री बनाया और जिसे अंग्रेÊाों की यातनायें नहीं तोड़ सकीं, जिसने आÊाद भारत की पहली सरकार में मन्त्री बनने का न्यौता ठुकरा दिया और जेल को दूसरा घर बना लिया, जिसने संसद को आवाÊा दी और आÊादी के डेढ़ दशक बाद पहला अविश्वास प्रस्ताव लाने का साहस किया, वो मृत्युशय्या से अपने ही लोगों को जनता से किये वादे याद दिला रहा था।
चौधरी साहब नहीं आए और न ही लगान माफ किया। लेकिन, लोहिया के शरीर में फैलते जहर की बेहोशी, धीरे -धीरे पूरी तरह हावी हो गयी। अक्तूबर 12, 1967 को लोहिया की गर्म साँसें थम गयीं। वर्ष 2010, लोहिया का जन्म शताब्दी वर्ष है जिसे 2009 से 2011 तक मनाया जा रहा है। लोहिया ठीक ही कहते थे, ‘लोग मेरी बात सुनेंगे, शायद मेरे मरने के बाद, लेकिन सुनेंगे Êारूर.. ।’