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बबूल का रोजाना कत्ल
आरिफ कुरैशी Monday, October 12, 2009 04:55 [IST]  

अजमेर. सरकार ने देसी बबूल को ट्रांजिट परमिट से मुक्त क्या किया, लोगों ने अंधाधुंध कटान से पेड़ों की इस प्रजाति को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया।



मनुष्य व पशुओं के लिए बेहद उपयोगी देसी बबूल के करीब 1000 पेड़ों का जिले में रोजाना ईंधन और फर्नीचर के लिए कत्ल किया जा रहा है। वनमाफिया, लोगों के लालच के कारण अजमेर का वन क्षेत्र सिकुड़ व पर्यावरण असंतुलन का खतरा बढ़ रहा है।




मानव व पशुओं के विभिन्न उपयोग में आने वाले देसी बबूल को राज्य सरकार ने 1990 में ईंधन व फर्नीचर में उपयोग के लिए ट्रांजिट परमिट से मुक्त किया था। इसके बाद से ही इस प्रजाति के पेड़ धड़ल्ले से काटे जाने लगे। अब हालत यह है कि इनकी संख्या बहुत कम रह गई है।



कुल्हाड़ी—आरी, बबूल पर भारी



जिले के सरवाड़, केकड़ी, किशनगढ़, ब्यावर व पुष्कर आदि क्षेत्रों में लगातार कटान से देसी बबूल कम होती जा रही है। विभाग के मुताबिक जिले में रोजाना करीब 100 ट्रॉली बबूल की कटी लकड़ी बिकने आती है। इस हिसाब से रोजाना एक हजार पेड़ों पर कुल्हाड़ी—आरी चलती है। देसी बबूल को विकसित होने में करीब 20 साल लगते हैं लेकिन लोग 6-7 साल उम्र के पेड़ को भी काट लेते हैं। अब क्षेत्र में मोटे व बड़े पेड़ों की संख्या बहुत कम रह गई है। वहीं कटे पेड़ों की जगह नए पेड़ नहीं लगाए जा रहे।



नीम से महंगी



लगातार उपयोग से अब इस प्रजाति की लकड़ी भी काफी महंगी हो गई है। जहां प्रतिबंतिध नीम की लकड़ी का मूल्य 125 रुपए है, वहीं देसी बबूल की लकड़ी 250 रुपए प्रति क्विंटल बिक रही है।



वन विभाग सुस्त



वन विभाग इस मामले में सुस्ती दिखा रहा है। लोगों को पर्यावरण संतुलन और बबूल के पौधरोपण के प्रति जागृत नहीं किया जा रहा। रेंज ऑफिसर महेश टांक के मुताबिक ट्रांजिट परमिट छूट के कारण कार्रवाई नहीं की जा सकती। सरकार के निर्देश पर विभाग ने देसी बबूल, विलायती बबूल, सू बबूल, अरड़ू, सफेदा, शीशम व इजरायली बबूल को ईंधन व फर्नीचर के रूप में उपयोग की छूट दी हुई है।



इसलिए हो रहा है नुकसान



बबूल कृषि भूमि में ही पाया जाता है। पहाड़ी व वन क्षेत्रों में यह नहीं पनपता। खेतों की मेड़ व आसपास के क्षेत्र में लगे पेड़ का मालिक किसान होता है, वह इसे काटकर बेच रहा है।



सुरक्षा व लाभ



ञ्चइस पेड़ से फसलों की सुरक्षा होती है। इसकी पत्तियां, कोमल डालियां व पातड़ी दुधारू व पालतू पशुओं का स्वादिष्ट भोजन है। लूम व पातड़ी के ठेके ही लाखों रुपए में उठते हैं।



डॉ. सुभाष गौड़, सहायक निदेशक, पशुपालन विभाग

 
 


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