अपनी निर्माण कंपनी में उन्हें करोड़ों का घाटा उठाना पड़ा, परंतु सभी बाधाओं को उन्होंने साहस के साथ पार किया। उनके समकालीन अभिनेता धर्मेद्र और विनोद खन्ना को उम्र के इस दौर में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली, परंतु उन्हें काम मिल रहा है, क्योंकि वह जवानी में अपने समकालीन अभिनेताओं से बेहतर कलाकार थे और उनका जुझारूपन हर दौर में काम आया। कड़ा परिश्रम और अनुशासन उनके व्यक्तित्व के सार तत्व हैं। अमिताभ बच्चन के जीवन में पहला महत्वपूर्ण मोड़ उस समय आया, जब उनकी मां को पूना में एक निर्माता ने नायिका बनने का प्रस्ताव दिया और उन्होंने सोचने के लिए समय मांगा। इसी दौरान उन्हें ज्ञात हुआ कि वे गर्भवती हैं। अत: एक संभावना थी कि अमिताभ बच्चन भी एक सितारा पुत्र हो सकते थे। यह उस समय की बात है जब अशोक कुमार अभिनीत ‘किस्मत’ के प्रदर्शन को थोड़ा ही समय हुआ था। उस समय कौन जानता था कि ‘किस्मत’ में पहली बार प्रस्तुत एंटी हीरो छवि के अन्यतम अभिनेता अमिताभ सिद्ध होंगे। दूसरा परिवर्तन आया 24 दिसंबर 1954 को, जब जवाहरलाल नेहरू की पहल पर हरिवंश राय बच्चन केंद्र सरकार के विदेश विभाग में नियुक्त हुए और उनके पास इतना धन आया कि वह अमिताभ को नैनीताल के प्रख्यात शेरवुड स्कूल में भेज सके। वहां भारत के धनाढच्य लोगों के पुत्रों के साथ अमिताभ का परिचय हुआ। उनकी जीवन-शैली को देखकर अमिताभ ने निश्चय किया कि बहुत सफल और अमीर आदमी बनना है। महत्वाकांक्षा का बीज नैनीताल में पड़ा। धन कमाने की इस ललक का निर्वाह वह आज भी कर रहे हैं और इस राह पर उन्होंने किस्म-किस्म के समझौते भी किए। दौलत की संकरी पगडंडी पर बहुत कांटे होते हैं और यहीं आदमी निर्मम होकर यह भी सीखता है कि सब बाधाओं और मूल्यों के साथ निर्ममता से पेश आना चाहिए। शेरवुड में ही अभिनय के लिए बालक अमिताभ को ‘कैंडल पुरस्कार’ मिला। कैंडल पुत्री जेनिफर का विवाह शशि कपूर के साथ हुआ था। बाद में अमिताभ और शशि कपूर ने अनेक फिल्मों में साथ काम किया। ऊपरवाले की पटकथा के दांव-पेंच किसी को समझ नहीं आते। तीसरा निर्णायक मोड़ तब आया, जब छोटे भाई अजिताभ की प्रेरणा और सहयोग से अमिताभ ने कोलकाता की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर अभिनय जगत में संघर्ष का निर्णय लिया। चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण मोड़ वह था, जब दर्जन भर असफल फिल्मों के बाद भी सलीम-जावेद की सिफारिश पर प्रकाश मेहरा ने उन्हें ‘जंजीर’ में अवसर दिया और फिल्म के अनकरीब पूरा होने पर सलीम साहब ने जीपी सिप्पी को फिल्म दिखाकर ‘शोले’ का अनुबंध करवाया तथा राजेश खन्ना की जगह ‘दीवार’ में अमिताभ को लेने की जिद भी की। पांचवां मोड़ अपने बालसखा राजीव गांधी के आग्रह पर चुनाव लड़ना और बोफोर्स में बेवजह फंसाए जाने का दुखद अध्याय रहा, जिसे लंदन की अदालत के फैसले ने उनके पक्ष में समाप्त किया। छठा निर्णायक क्षण था जब बेहिसाब कर्जो में डूबे अमिताभ को मुकेश अंबानी ने सलाह दी कि अभिनय के रास्ते पर चलकर ही वह पार पाएंगे क्योंकि इसी काम में वह निपुण हैं और इसी के बाद उन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और यश चोपड़ा की ‘मोहब्बतें’ अनुबंधित की। यहीं से कर्ज मुक्ति की राह प्रशस्त हुई। परेशानियों के दौर में उन्होंने कुछ ऐसे लोगों से हाथ मिलाया, जिनकी वजह से उनकी छवि में परिवर्तन आया। आज अमिताभ बच्चन के लिए यादों की जुगाली के साथ आत्मावलोकन का भी अवसर है और वह स्वयं ही सोच सकते हैं कि उन्होंने क्या खोया और क्या पाया, या बतर्ज अपने पिता की आत्मकथा के पहले भाग की तरह ‘क्या भूलूं, क्या याद करूं’। क्या उन्हें वे पायदान याद हैं, जिन पर कदम रखकर वह ऊपर चढ़े? क्या भाई अजिताभ से आज पहले की तरह मधुर रिश्ता कायम है? क्या वह अपने पिता की तरह सच्चई की शपथ लेकर अपनी आत्मकथा लिख सकते हैं? केवल व्यक्ति ही स्वयं को कठघरे में खड़ा करके स्वयं ही जज की कुर्सी पर बैठकर फैसला कर सकता है। आत्मा की अदालत से बड़ी कोई अदालत नहीं।
अमिताभ बच्चन चालीस साल से अभिनय कर रहे हैं और इस दरमियान उन्होंने अनेक कीर्तिमान बनाए हैं। आज भी उनकी पारी जारी है। इतनी लंबी पारी खेलना आसान नहीं है। ‘कुली’ की शूटिंग के दौरान हुई दुर्घटना के बाद अस्पताल में एक क्षण ऐसा भी आया था कि उन्हें मृत मान लिया गया था, परंतु वह वापस आ गए। उसके बाद उन्हें मायस्थेनिया ग्रेविस नामक घातक रोग हुआ।