नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सुझाव दिया है कि सीआरपीसी के प्रावधान (आदेश-6, नियम-7) को हटा देना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यह सर्वाधिक दुरुपयोग किया जाने वाला ऐसा कानून है, जिसे मुकदमे को लंबा खींचने में इस्तेमाल किया जाता है। इस फैसले का मकसद अपने लाभ के लिए मुकदमों को लंबा खींचने की कोशिशों को विफल करना है।
शीर्ष कोर्ट ने कहा कि मुकदमों के बोझ से पहले ही परेशान सिविल कोर्ट लंबी-लंबी तारीखें देने पर विवश हो जाता है। इससे विवादों के निपटारे में देरी होती है।
जस्टिस दलवीर भंडारी तथा एचएस बेदी की बेंच ने कहा कि अधिकार का इस्तेमाल न्यायपूर्वक होना चाहिए तथा अदालतों को दूसरे पक्ष को होने वाली गैर जरूरी देरी तथा असुविधा की प्रतिपूर्ति करने पर विचार करना चाहिए।
उदाहरण के लिए वाद खर्च (कोस्ट) लगाने का मकसद दुर्भावनापूर्वक लाए जाने वाले संशोधनों को हतोत्साहित करना है, जो कानूनी प्रक्रिया में देरी लगाने के इरादे से पेश किए जाते हैं। अदालती मामलों के त्वरित निपटारे के उद्देश्य से सरकार ने विधि आयोग की सिफारिश पर इस प्रावधान को हटा दिया था, लेकिन ‘जनाक्रोश’ के नाम पर इसे बहाल कर दिया गया था।