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टेलीफोन है न इंटरनेट, कैसे करेंगे मुकाबला दुनिया का
पंकज कुमार पांडेय Tuesday, October 13, 2009 06:47 [IST]  

नई दिल्ली. शिक्षा के मामले में पहुंच के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्वालिटी की है। गुणवत्ता के संकट से दो-चार हो रहे हमारे देश में विभिन्न राज्यों के बीच असमानता और राज्यों के भीतर ही गांव और शहरों के बीच भारी अंतर हैरान करने वाला है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट में राजस्थान और उड़ीसा के गहन केस स्टडी और सर्वे के जरिए पेश की गई स्कूली शिक्षा की तस्वीर केंद्र और राज्य सरकारों को चेताने वाली है।



इस रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान के गांव में बने तकरीबन 67 फीसदी सेकेंडरी स्तर के सरकारी स्कूलों में टेलीफोन की सुविधा नहीं है। उड़ीसा में भी लगभग 66 फीसदी सरकारी सेकेंडरी स्कूल बिना टेलीफोन के हैं। इंटरनेट के मामले में तो हमारे गांव सिफर के आंकड़े से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। चांद पर तिरंगा लहराने के बावजूद देश के भीतर एक हकीकत यह भी है कि हम अपने बहुत से स्कूलों में बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंचा पाए हैं।



यह हालत तब है जब देश में हर साल गांव और पिछड़े इलाकों पर विशेष फोकस के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। हालांकि राजस्थान और उड़ीसा में केस स्टडी वर्ष 2005 में की गई थी, लेकिन विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट में इसे आधार मानकर गांव और शहरों के बीच असमानता का खुलासा किया गया है। विश्व बैंक के प्रतिनिधियों का मानना है कि अभी भी ऐसा ही अंतर बरकरार है। विश्वबैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुविधाओं की उपलब्धता और लर्निग रिसोर्स का सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। ऐसे में इन इलाकों पर खास ध्यान देने की जरूरत है।



आंखें खोलते आंकड़े : राजस्थान के महज 33 प्रतिशत सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में टेलीफोन हैं जबकि किसी सरकारी सेकेंडरी स्कूल में इंटरनेट नहीं है। पांच प्रतिशत सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां पीने का पानी भी नहीं। तकरीबन 21 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में नहीं पहुंची है बिजली।



21 प्रतिशत सरकारी स्कूल ऐसे भी जहां संतोषजनक ढंग के क्लास रूम नहीं हैं। 50 प्रतिशत स्कूलों में विज्ञान लैब नहीं, जबकि कंप्यूटर लैब से 57 प्रतिशत सरकारी स्कूल वंचित हैं। हालांकि राजस्थान के गांव में बने निजी स्कूलों में 67 प्रतिशत के पास टेलीफोन और सात प्रतिशत के पास इंटरनेट कनेक्शन हैं। उड़ीसा में महज 34 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में टेलीफोन हैं। यहां निजी स्कूलों में हालत और खराब है, महज 13 प्रतिशत में टेलीफोन है। सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 74 प्रतिशत है।

 
 


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