नायक की आधार भूमि
जयप्रकाश चौकसे Wednesday, October 14, 2009 00:27 [IST]  

Amitabh Bachchanसफल लेखिका अरुंधति राय का कहना है कि अमिताभ बच्चन ने अपनी शुरुआती फिल्मों में आम आदमी और उसके संघर्ष को परदे पर प्रस्तुत करके अपार लोकप्रियता अर्जित की। हालांकि बाद की फिल्मों में वह महलों में रहने वाला पात्र अभिनीत करने लगे, परंतु आज भी वह प्रारंभिक फिल्मों की जमा-पूंजी अर्थात गुडविल ही खा रहे हैं। गोयाकि उनकी आज की लोकप्रियता का आधार ‘जंजीर,’ ‘शोले,’ ‘त्रिशूल’ और ‘दीवार’ फिल्में ही हैं। राय मोहतरमा का खयाल है कि यह एक प्रतिभाशाली व्यक्ति की त्रासदी ही मानी जानी चाहिए। उन्होंने इस पर भी अफसोस जाहिर किया है कि मल्टीप्लैक्स में सफलता पाने वाला सिनेमा सच्च भारतीय सिनेमा नहीं है।

फ्रांस में सिनेमा की खोज करने वालों द्वारा बनाई गई प्रारंभिक फिल्मों में से एक में मजदूर को मिल के गेट से बाहर निकलते हुए दिखाया गया था, जिसका आशय यह भी था कि इस नए माध्यम का नायक आम आदमी ही होगा। दरअसल सिनेमा के अर्थतंत्र की रीढ़ की हड्डी आम दर्शक ही रहे हैं, जिनके उन्माद से बॉक्स आफिस पर धन बरसा है। गोयाकि सिनेमा राग दरबारी नहीं है, वरन आम आदमी का लोकगीत है। यहां तक कि अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश ने भी प्राय: अमीर आदमी को खलनायक की तरह ही प्रस्तुत किया है।

अमीर की पिटाई पर सिनेमाघर में तालियां बजती हैं। दरअसल सारे अमीर खलनायक नहीं होते, जैसे सारे गरीब भले आदमी नहीं होते। सिनेमा अधिकतम लोगों तक पहुंचने के उद्देश्य के कारण आम आदमी को नायक बनाकर प्रस्तुत करता है। फिल्म की सफलता की खातिर कुछ भ्रम पैदा हो गए हैं। मणिरत्नम की फिल्म ‘गुरु’ का नायक अमीर है और फिल्म सफल रही। इससे स्पष्ट है कि नायक के अमीर या गरीब होने की बात से बड़ी बात यह है कि नायक जीवन मूल्यों के लिए लड़ता है। जवाहरलाल नेहरू अत्यंत अमीर घराने से आए थे, परंतु मूल्यों के लिए किए गए संघर्ष के कारण उन्हें नायक माना गया है। जॉन एफ कैनेडी के पिता भी बहुत धनाढ्य व्यक्ति थे।

सिनेमा के प्रारंभ में ही इस माध्यम के पहले कवि चार्ली चैपलिन ने हमेशा आम आदमी को ही नायक की तरह प्रस्तुत किया और उनकी परंपरा आज भी जारी है। 1968 के बाद अमेरिका में बनी सफलतम फिल्मों में अधिकांश विज्ञान फंतासी हैं या हॉरर फिल्में हैं। चैपलिन की परंपरा को टेक्नोलॉजी ने नुकसान पहुंचाया। इस दौर में भी ‘टाइटेनिक’ जैसी विराट सफलता वाली फिल्म का नायक गरीब आदमी है और इस फिल्म में टेक्नोलॉजी की बहुत सहायता ली गई है।

विगत दशकों में ‘सुपरमैन,’ ‘बैटमैन’ इत्यादि फिल्मों से आम आदमी को नायक की तरह प्रस्तुत करने की परंपरा अवरुद्ध हुई है। पूरी दुनिया में बच्चों के बॉक्स ऑफिस मूल्य ने इस तरह की फिल्मों को खूब पनपने दिया है। ऋतिक रोशन की ‘कोई मिल गया’ और ‘क्रिश’ की विराट सफलता का आधार भी बच्चे ही हैं। दरअसल आज ‘नायक कौन हो’ का मामला बाजार और विज्ञापन की ताकतों ने बहुत उलझा दिया है। नकली समृद्धि का हौव्वा खड़ा कर दिया है, हर छोटे-बड़े शहर में शॉपिंग मॉल अपने मोहक मायाजाल में मनुष्य को गैर-उपयोगी वस्तुओं को खरीदने के लिए भरमा रहे हैं और इन्हीं शक्तियों ने जीवन मूल्यों में भी भारी परिवर्तन किया है। दूसरी ओर राजनीति में कोई आदर्श नहीं है, इसलिए नायक की आधार भूमि ही फिसलन भरी हो गई है।

 
 


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