भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती ऐसी रही है कि विश्वव्यापी मंदी का उतना बुरा असर हमारे यहां नहीं हुआ, जितना कई अन्य देशों पर पड़ा। बावजूद इसके रोजगार का क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ। देश में न केवल नियोजित बल्कि असंगठित क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में लोगों को अपने रोजगार गंवाने पड़े। नए रोजगार नहीं मिलने के साथ ही छंटनी से बेरोजगारी की समस्या विकराल हो चली है। बेरोजगारी कई सामाजिक-आर्थिक संकट पैदा करने वाली होती है। अब औद्योगिक विकास दर में तेजी से हो रही बढ़ोतरी से रोजगार की नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं। सेंसेक्स का 17000 को पार कर जाना उद्योग जगत के साथ ही निवेशकों के लिए भी सुखद है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने इसे देश और उद्योग, व्यापार जगत के लिए दीपावली का तोहफा कहा है। सरकार के लिए चुनौती अब यह है कि दीपावली का यह तोहफा उद्योग, व्यापार या निवेशकों तक ही सीमित न रहे, बल्कि उत्पादन में वृद्धि का यह लाभ समूचे देश को मिले, खासकर उस तबके को जो मंदी की मार के नाम पर हाशिए पर डाल दिया गया था। सरकारी आंकड़ों में मुद्रास्फीति की दर घटने के बाद भी आम उपभोक्ता अभी भी महंगाई की मार से नहीं उबर पाया है। औद्योगिक विकास दर का महत्वपूर्ण पहलू उपभोक्ता सामग्री की दर में 22 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी तथा घरेलू मांग में आई तेजी भी है। उपभोक्ता यानी आम आदमी की क्रय शक्ति में भी इसी तरह का इजाफा करने के प्रयासों से ही बेहतर अर्थव्यवस्था का लाभ उसे मिल सकेगा। जिस आंतरिक मजबूती के सहारे देश की अर्थव्यवस्था मंदी की मार से जल्दी ही उबरने की स्थिति में है, उसे और मजबूत करते हुए आम लोगों की आर्थिक मजबूती में ही आर्थिक उपलब्धि की सार्थकता निहित है।
औद्योगिक उत्पादन में अगस्त में दर्ज दस फीसदी से अधिक की विकास दर भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रहे सुधार की परिचायक मानी जा सकती है। औद्योगिक उत्पादन में इस बढ़ोतरी का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि निर्माण क्षेत्र में अपेक्षा से अधिक विकास दर दर्ज की गई। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का पिछली तिमाही में 5.8 से बढ़कर 6.1 प्रतिशत हो जाना भी मंदी से उबरने का ही संकेत देता है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने मंदी से उबरने की इस प्रक्रिया के तेज होने की संभावना व्यक्त की है।