जुए का उल्लेख राम के युग के सैकड़ों वर्ष बाद घटित महाभारत में है। धर्मराज युधिष्ठिर का दो बार जुआ खेलना ही भाइयों के युद्ध की कथा का निर्णायक मोड़ है। द्रौपदी का अपमान पूरे देश को इतना महंगा पड़ा कि बाद में दशकों तक यह देश युवा विधवाओं, लाचार बूढ़ों और कमजोर बच्चों का देश रहा। हेमचंद्र पहारे का कहना है कि जुआ खेलने की प्रवृत्ति आर्यो के साथ ही भारत आई है। यह बात गौरतलब है कि सभ्यता के विकास के दो सबसे पुराने देश भारत और चीन में जुआ खेलने के प्रति हमेशा ही जबरदस्त जोश रहा है। अंग्रेेजी भाषा में जीत के अवसर शून्य होने पर कहते हैं कि तुम्हारे पास चीनी व्यक्ति जैसा भी मौका नहीं है। यह आश्चर्य की बात है कि महान संस्कृतियों के विकास वाले देश जुआरी रहे हैं और आज भी हैं। जुआ खेलने के मूल में कुछ तो साहस हो सकता है, परंतु अनार्जित धन प्राप्त करना उसका मूल है। खेलते समय जीतने के अवसर कम होते हैं, तब भी अवसर लेने की अदम्य आकांक्षा होती है। डॉ. विजयपत सिंघानिया हीलियम गुब्बारे में एक लाख बीस हजार फीट की ऊंचाई पर जाना चाहते हैं। इस ऊंचाई पर जाने पर लौटने के अवसर कम हैं, परंतु राष्ट्र के लिए एक और कीर्तिमान रचने की अदम्य आकांक्षा उम्र के इस दौर में उन्हें प्रेरित कर रही है। यह जान की बाजी लगाना भी एक जुआ है, परंतु इसका उद्देश्य महान है। सभी साहसी कारनामे करने वाले जुआरी होते हैं और उनमें से अनेक के पास खोने को कुछ नहीं होता। इसी शून्य में कामयाबी के बीज छिपे हैं। वास्को डी गामा क्या खोजने निकले थे और क्या खोज लिया। छोटे से अवसर के लिए बड़ी बाजी लगाना कई महत्वपूर्ण उपलब्धियों के मूल में है। तर्क और अवसर में कोई तालमेल नहीं होता। आप तर्क तजकर ही जुआ खेल सकते हैं। शायद इस चांस के कारण ही क्रिकेट भारत में लोकप्रिय है, परंतु चीन में यह नहीं खेला जाता। फिल्म निर्माण भी चांस की बात है। हर निर्माता जानता है कि प्रतिवर्ष केवल दस या पंद्रह प्रतिशत ही फिल्में सफल होती हैं, परंतु उसे न जाने क्यों लगता है कि उसकी फिल्म इनमें से एक है। निर्माता जुआरी प्रवृत्ति का ही होता है। सरल, साधारण सी बात यह है कि सफलता के इतने कम प्रतिशत वाले व्यवसाय में जाना तर्कहीन है। वी शांताराम, मेहबूब खान, राज कपूर और गुरुदत्त जैसे लोगों की सोच ही अलग थी। उनके लिए फिल्म बनाना सांस लेने की तरह था और वे प्राय: महान प्रयास करते थे जो बॉक्स ऑफिस के परे एक विशेष अर्थ रखता था। जब राज कपूर को उनके नजदीकी लोगों ने सलाह दी कि ‘जागते रहो’ के अवसर अत्यंत क्षीण है, तब उन्होंने कहा कि यह कथा उनके प्राणों में बस गई है और इसे बनाने के बाद ही वह कुछ और सोच सकते हैं। लगभग सौ साल के इतिहास में कुछ मुट्ठीभर समर्पित फिल्मकारों को छोड़ दें, तो शेष सब जुआरी प्रवृत्ति के लोग रहे हैं। फिल्में ताश के पत्तों की तरह फेंटी, पीसी और बांटी जा रही हैं। चिड़ी की र्दुी वाला करोड़ों की डबल ब्लाइंड खेल रहा है, हुकुम के इक्के वाला ठप्प हो रहा है। इसमें हारा हुआ जुआरी हमेशा डबल की चाल खेलता है। सितारे रूपी जोकर के मिल जाने से पान की र्दुी और तर्िी जीतने वाला कांबिनेशन बन जाता है। सारा फिल्म उद्योग विशाल जुएखाने में बदल चुका है। केवल नाल काटने वाला अमीर हो रहा है। पिटे हुए खिलाड़ी के बदले नए जुआरी आ रहे हैं। सिनेमा और क्रिकेट- चांस आधारित खेल जुआरियों के देश में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं।
उजास के इस महान उत्सव दीपावली में एक कालिख है- जुआ खेलने की रस्म। राम के विजयी होकर अयोध्या लौटने पर जनता ने घरों में दीये जलाए थे, परंतु लक्ष्मी पूजन शायद बाद में शामिल हुआ। भारत एकमात्र देश है, जिसमें लक्ष्मी पूजन का उत्सव है। हमारी आध्यात्मिकता थोड़ी सी संदिग्ध हो जाती है।