सिनेमा में प्रस्तुत तर्कहीनता के पीछे एक तर्क है। सिनेमा में धार्मिक आस्था भी एक विशेष विचार के तहत प्रस्तुत की जाती है। धार्मिक स्थल पर की गई प्रार्थना बेअसर नहीं जानी चाहिए मसलन ‘लगान’ फिल्म में हार की कगार पर सामूहिक प्रार्थना के दृश्य के बाद भुवन मैच जीत लेता है। इसके विपरीत फिरोज खान की फिल्म ‘जांबाज’ में इबादत के बाद अनिल कपूर को मरते हुए दिखाया है। फिल्म असफल रही, जिसके और भी कारण थे। काल्पनिक कथाओं का भी एक आधार होता है, विचार होता है। फिल्मकार की सारी कोशिश दर्शक के अविश्वास को स्थगित करने पर टिकी रहती है या कहें कि बिना प्रश्न पूछे सहज विश्वास पर आधारित इस खेल में अनिश्चय की हद यह है कि दर्शक के विश्वास रूपी सुई की नोक से फंतासी का हाथी निकल जाता है, परंतु उसकी दुम अटक जाती है। हर फिल्मकार दर्शक की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाता है। उसके पास सिनेमाई तर्क या कहें स्वतंत्रता का रबर होता है, जिसे वह टूटने की सीमा तक इस्तेमाल कर सकता है। फूहड़ फिल्मकारों के पास च्युइंगम होता है। इसलिए हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि ऊबा हुआ दर्शक कई बार अपना च्युइंगम सीट पर चिपका कर चला जाता है, जो नए दर्शक की जीन्स पर चस्पा हो जाता है, परंतु उसका क्रोध निर्माता तक नहीं पहुंचता। कुछ निष्णात फिल्मकार प्रस्तुतीकरण की कला के सहारे ऐसा कुछ रचते हैं, जिसमें दर्शक का अविश्वास बह जाता है। जैसा हमने ‘गजनी’ और ‘वांटेड’ फिल्म में देखा। प्राय: दर्शक अविश्वास की भावना को स्थगित करके ही फिल्म देखने जाता है और परदे पर प्रस्तुत को सच ही मानता है। कुछ फिल्मकार उसके इस भाव को ठेस पहुंचाते हैं और बार-बार याद दिलाते हैं कि वह फिल्म देख रहा है मसलन ‘जानेमन’ फिल्म में गाने की स्थिति पर वादक कमरे में घुस आते हैं और कहते हैं कि गाने के लिए हम वादक आए हैं। इस तरह के दृश्य दर्शक का मोहभंग करते हैं। दर्शक फिल्मकार को बहुत ढील देता है कि वह अपनी कल्पना की पतंग उड़ाता रहे, परंतु जब वह दर्शक को मूर्ख मानने लगता है तब दर्शक उसकी पतंग काट देता है। अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘ब्लू’ में नायक समुद्र के बीच तूफान के समय मोटरबाइक लेकर कूद पड़ता है और तल में उसके ट्यूब से हवा अपने फेफड़ों में भरता है। इसे दर्शक अस्वीकार करता है। दरअसल दर्शक के विश्वास करने की हद के बारे में कभी कुछ पता नहीं चलता। वह मूडी जिद्दी बच्चे की तरह है। कभी पसंद की गई चीज हमेशा पसंद करेगा यह मुमकिन नहीं है। उसके व्यवहार के आधार पर कुछ मोटी बातों का फिल्मकार ध्यान रखते हैं जैसे धार्मिक सहिष्णुता, लोकप्रिय नैतिकता, अच्छाई की जीत, राष्ट्र प्रेम! उसके मानदंड बदलते रहते हैं। हास्य फिल्म में अविश्वसनीय संयोग वह सहन कर लेता है, परंतु साहस कथाओं में नहीं करता। सिनेमा का सच और संयोग यथार्थ जीवन से बिल्कुल अलग है। दर्शक उन फिल्मों को भी पसंद करते हैं, जिनमें जीवन का सच जस का तस प्रस्तुत है। यह दर्शक की योग्यता है कि सिनेमा में प्रस्तुत फंतासी के कारण यथार्थ के प्रति उसका दृष्टिकोण नहीं बदलता। केवल सितारे अपनी लोकप्रियता के भ्रम को स्थायी और सच मानते हैं।
सिनेमा में प्रस्तुत सच, सामाजिक हालात, समय, संयोग, स्थान और तर्क यथार्थ जीवन में स्थापित मानदंड से अलग होते हैं। इस माध्यम की अपनी सीमाएं और स्वतंत्रता भी हैं। दशकों की कथा ढाई घंटे में दिखाई जाती है। पात्र देश-विदेश की दूर-दराज जगहों पर जाते हैं और दूरियां सिनेमाई क्षणों में सिमट जाती हैं।