Ludhiana
महज नौकरी से रिटायर हुआ हूं जिंदगी से नहीं
असीम जैन Tuesday, October 20, 2009 03:39 [IST]  

लुधियाना. जिंदगी में मुश्किलें बहुत आती हैं, पर कभी इनसे घबराना नहीं चाहिए। इनका डट कर सामना करोगे तो हमेशा सफलता आपके कदम चूमेगी। इन्ही सफलताओं को अर्जित करने वाले रिटायर्ड प्रोफेसर डा. फकीर चंद शुक्ला एक विलक्षण प्रतिभा के मालिक हैं। डॉ. शुक्ला उच्चकोटि के वैज्ञानिक, साहित्यकार तथा कलाकार हैं।



सितंबर 1944 में गांव खिजराबाद जिला रोपड़ जन्में डा. फकीर चंद शुक्ला का जीवन शुरू से ही मुश्किलों से भरा रहा, लेकिन इन मुश्किलों को अपने पर हावी न होने देकर वे निरंतर आगे बढ़ते रहे। गांव के ही सरकारी स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्चशिक्षा के लिए लुधियाना आ गए। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से एमएससी बायो टेक्नोलोजी करने के बाद फूड टेक्नोलोजी में पीएचडी की।



1970 में इनकी पीएयू में बतौर लेक्चरर नियुक्ति हुई। वर्ष 2004 में 35 साल की नौकरी करने के बाद रिटायर हुए डा. शुक्ला का सोयाबीन से दूध तथा पनीर बनाना, योगहर्ट, पनीर का आचार, स्वास्थ्यवर्धक पेय बनाने में उत्कृष्ट योगदान रहा। इसी संबंध में अनुसंधान के लिए इन्हें 2003 में डा. परूथी अवार्ड से सम्मानित किया गया।



डा. फकीर चंद शुक्ला का पहला उपन्यास 1970 में ‘पंख कटी गौरैया’ प्रकाशित हुआ। 1970 से लेकर अब तक उनकी 37 किताबें प्रकाशित हो चुकी है, जिनमें कहानियां, नाटक, बाल साहित्य आदि शामिल हैं। उनकी कुछ किताबों का कन्नड़, तेलगू, सिंधी, गुजराती, मराठी, मलयालम तथा उर्दू में अनुवाद हो चुका है।



1972 में स्नेहप्रभा के साथ शादी के बंधन में बंधने वाले डा. शुक्ला अपनी इस सारी सफलता का श्रेय अपनी स्वर्गवासी पत्नी को देते हुए कहते है कि उनकी पत्नी ने उनके इस सारे सफर में साथ दिया। कलाकार के तौर पर डा. शुक्ला ने स्वयं भी दो दर्जन से अधिक नाटकों में अभिनय किया है।



हिंदी तथा पंजाबी दोनों भाषाओं में लिखने वाले डा. शुक्ला को जहां हिंदी में बढ़िया योगदान देने के लिए मिलेनियम अवार्ड के सम्मान से नवाजा गया वहीं पंजाबी भाषा के लिए शिरोमणि साहित्यकार अवार्ड मिला जिसमें गोल्ड मैडल तथा एक लाख रुपये का एक नकद पुरस्कार दिया गया।



डॉक्टर शुक्ला ने लोगों को आहार संबंधी जानकारी देने के लिए 300 से अधिक लेख लिखे। डा. शुक्ला को अब तक 9 नेशनल अवार्ड, विभिन्न राज्यों के 15 स्टेट अवार्ड, पंजाब रत्न अवार्ड सहित कई अवार्ड मिल चुके हैं। समाज सेवा का शौैक रखने वाले डॉक्टर शुक्ला का कहना है कि वे नौकरी से रिटायर हुए हैं, जिंदगी से नहीं। फिलहाल डा. शुक्ला इस समय पंजाब साहित्य कला मंच के प्रधान हैं।



याद आता है वह दिन



डॉक्टर फकीर चंद शुक्ला बताते हैं कि सन 2000 में जब उनको शिरोमणि अवार्ड मिलने की घोषणा हुई तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा। यह दिन उन्हें कभी नहीं भूलेगा। उन्होंने बताया कि उन्हें हमेशा लगता था कि जितना काम उन्होंने इस क्षेत्र में पिछले कई सालों से किया है, उसका फल उन्हें जरूर मिलेगा। जैसे ही उन्हें यह पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई, तो उनके किसी परिचित ने उन्हें फोन पर इस बात की सूचना दी।



डॉक्टर शुक्ला को अब तक मिले कुछ प्रमुख अवार्ड



1980 में‘खुराक व सेहत’ के लिए नेशनल अवार्ड।



1981 में ‘सस्ता भोजन बढ़िया भोजन’ के लिए नेशनल अवार्ड।



1983 में कहानी संग्रह ‘विषपान’ के लिए अवार्ड।



1995 में कहानी संग्रह ‘नई सुबह’ के लिए भाषा विभाग पंजाब द्वारा सर्वश्रेष्ठ पुस्तक का अवार्ड।



1995 में नाटकों की पुस्तक ‘जोत से जोत जले’ के लिए मोहन राकेश अवार्ड।



1996 में बाल साहित्य ‘सच्ची खुशी’ के लिए नेशनल अवार्ड।



2000 में वर्ल्ड हिंदी कांग्रेस द्वारा मिलेनियम अवार्ड से सम्मानित।



2000 में पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि साहित्कार अवार्ड से सम्मानित।

 
 


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: