हुण ते बस यादां ही बचीयां ने
Bhaskar News Tuesday, October 20, 2009 03:57 [IST]  

भारत के लिए विभाजन, बंटवारा, तक्सीम या पार्टीशन-इन अलफाजों के बहुत गहरे मायने हैं। लोग रातों-रात बंट गए। आपसी सद्भाव का ढांचा चरमरा गया। अपना ही घर अजनबी दिखने लगा। लाखों लोगों ने अपना सबकुछ गंवा दिया। मात्र यादें शेष बची थीं। और यादों का कोई इतिहास नहीं होता।



यादें तो बस अतीत बनकर रह जाती हैं। तपते रेगिस्तान में जिस तरह पानी की एक बूंद के लिए मुसाफ़िर तड़पते हैं, वही हाल विभाजन की शिकार औरतों का भी हुआ था। औरत चाहे हिंदू हो, मुस्लिम हो या फिर सिख, उसके दर्द का इतिहास सदा एक-सा रहा है। बंटवारा घरों का हो या मुल्कों का, रिश्तों का हो या स्वयं के अस्तित्व का, सबसे Êयादा प्रभावित औरतें ही होती हैं।



लाहौर से दिल्ली अपने रिश्तेदारों के घर आई 84 वर्षीय अस्मा कौर बताती हैं- ‘उस व़क्त मैं अपने बच्चों के साथ दहशतगदरें से भागती फिरती थी, उन्होंने मेरी बेटी को मुझसे छीन लिया और..।’ उनके आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बड़ी हिम्मत करके वह आगे कहती हैं— ‘हुण ते बस यादां ही बचीयां ने कुड़िए, सिर्फ़ यादां।



मेरे पति और सास-ससुर को बड़ी बेरहमी से काट डाला गया। मैं जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर कैंप में पहुंच गई थी। सो आज तक ंिज़ंदा हूं। या यूं कह लो ज़िंदा लाश हूं। उन लोगों ने मेरे साथ भी बदसलूकी की और फिर कई दिनों तक मैं कैंप में बेसुध रही।’



विभाजन ने औरतों को जिस्मानी ही नहीं मानसिक तौर पर भी पंगु बना दिया था। धीरे-धीरे रिस रहे धावों पर मरहम लगाने का साहस किसी में न था। पर ज़िंदगी रुकती नहीं। वह अनवरत चलती रहती है। जैसे बहती है नदी अनवरत.. चीरकर पहाड़ों को बना लेती है अपने लिए रास्ता और ना जाने कितने मोड़ों से गुÊारते हुए अपने अस्तित्व को कायम करने में कामयाब रहती है?
औरत भी एक नदी ही है, जो बह रही है।



कभी हिंदोस्तान में तो कभी पाकिस्तान में। पदमा सचदेवा कहतीं हैं- ‘औरत हिंदोस्तान की हो या पाकिस्तान की सारी उम्र वह बंटवारे की मार झेलती रही। अगर पाकिस्तान में कुछ दिन बिताने के बाद कोई हिंदू औरत लौटी, तो उसके बच्चे वहीं रह गए। वह सारी उम्र झूले की तरह झूलती रही- कभी हिंदोस्तान, तो कभी पाकिस्तान। धीरे-धीरे उसका बंटवारा होता रहा और इसी अंर्तद्वंद्ध में कई औरतें मर खप गईं।’



जालंधर में जब मैंने गांधी वनिता आश्रम की सुप्रिटेंडेंट सुनीता से बात की, तो उन्होंने बताया—‘कई औरतों के बच्चे पाकिस्तान में रह गए थे। वे उस दर्द की पीड़ा से अपनी सुध-बुध खो बैठी थीं। कई औरतें ऐसी थीं, जिनके घाव पर मरहम लगाने वाला कोई न था और कुछ ऐसी औरतें थीं, जो कैंपों में बार-बार बलात्कार का शिकार हुईं। बंटवारे के बाद चाहें जो मरहम उनके घावों पर लगाया जाए, ज़ख्म हमेशा ताÊा ही रहते हैं।



आज भी स्त्रियों के अवचेतन में अतीत के विभत्स दृश्य कौंध जाते हैं। उन औरतों के सीने में छिपे उस तूफ़ान को कोई नहीं देख पाता, जो हल्की-सी ठेस लगते ही उमड़ पड़ता है, कभी आंसूओं में तो कभी सूनी आंखों में। अपनी शोध यात्रा के दौरान विभाजन से पीड़ित जिन औरतों से बातचीत की, उनके अंतर मन की पीड़ा और वेदना को महसूस करने के लिए मुझे अपने हृदय पर सौ-सौ मन पत्थर रखने पड़े। यह यात्रा अपने आप में दर्द रही। - अंजना बख्शी

 
 


अपने विचार यहां लिखें:
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: