समाज की नदी में उत्सव बाढ़ के पानी की तरह उफान पर होता है। उत्सव समाप्त होने पर नदी किनारों पर कचरा छोड़कर सामान्य मंथर गति से लौट जाती है। सड़कों पर छोड़े हुए पटाखों के अवशेष बिखरे हैं, हवाओं में बारूद की हल्की सी गंध मौजूद है। कुछ मिठाई वाले परेशान हैं कि मिलावटी मावे की खबरों के कारण अब अनबिकी मिठाइयों का क्या करें। यह भी किनारे के कचरे की तरह हैं।
मावे के विपरीत बारूद कभी बासी नहीं होता। यही हाल है नकारात्मक शक्तियों का कि उनकी धार कभी कम नहीं होती और सकारात्मक शक्तियां बाढ़ के पानी की तरह उतार पर चली जाती हैं। पारिवारिक और सामाजिक मुलाकातों का दौर समाप्त हो गया है। हाथ में मिलन की ऊष्मा कायम है।
किसी से गले मिले थे, परंतु दिल नहीं मिले। हालांकि स्पर्श की स्मृति भी कम नहीं। किनारे पर सबसे बड़ा कचरा मोबाइल में जमा शुभकामना संदेशों का है और डिलीट करने के बाद भी कुछ संदेश स्मृति पटल पर अंकित हैं। विज्ञापनों के अनचाहे संदशों से बोझिल मोबाइल अभी भी हाथ में कराहता सा लगता है। सूखे मेवे और सूखकर बेहतर स्वाद देते हैं। तेल निकालकर बेची सस्ती बादाम सुपारी से बेहतर है।
सुखद गुजश्ता दीवाली के दीए आज भी आंखों में उजास भर देते हैं। दीवालियों का फर्क कीमतों के आईने में साफ नजर आता है। बोनस के बांस पर चढ़कर आसमानी कीमतों को नहीं छुआ जा सकता। विपरीत हालात में भी उत्सव तो मनाना है, क्योंकि खुशी का होम्योपैथिक डोज भी नैराश्य को दूर कर देता है।
आज सुख सहज-स्वाभाविक रूप से उपलब्ध नहीं है, परंतु उसे हासिल करना ही है। सरकारों की तमाम साजिश के बावजूद उस पर हमारा पैदाइशी हक है। जब राजमार्ग भ्रष्ट घुसपैठियों के ट्रैफिक से अवरुद्ध हो, तब आम आदमी खुशी की पगडंडी खोजने में पटु है, क्योंकि वह सदियों से इसका अभ्यस्त है।
अमीर लोग उत्सव की थकान मिटाने छुट्टी पर जाने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि ताश खेलते-खेलते हाथों में दर्द हो रहा है, शैंपेन पीते-पीते पेट फूल गया है, पकवानों ने हाजमा बिगाड़ दिया है। इनका डॉक्टर खुद नशे में गाफिल है। कोठियों के किनारों पर खाली बोतलों का कचरा जमा हो गया है। बारह महीने कचरा बीनकर जीवन यापन करने वालों की संख्या का अनुमान लगाना कठिन है। दीवाली उनके लिए अतिरिक्त कमाई का शुभ अवसर है।
उत्सव नदी के किनारों पर सुखद दृश्य है पुलिसवालों के घर का, जहां दीवाली के बाद दीवाली मनाते हैं, क्योंकि 48 घंटों की नौकरी के बाद स्वामी घर आया है। यही हाल अखबारों के दफ्तरों में काम करने वालों का है। फायर ब्रिगेड संतोष की सांस लेता है।
फिल्मकार उनींदा है। जिस निर्माता की फिल्म दीवाली पर प्रदर्शित नहीं हुई, वह दावत देता है अपने दुश्मन की फिल्म की असफलता का जश्न मनाने के लिए। उत्सव नदी के किनारे यह सबसे गंदा कचरा है। उत्सव में भी प्रतिद्वंद्विता का हौव्वा घुस आया है। पड़ोसी की पांच हजारी लड़ है, तो हमें दस हजारी फूंकना है। पड़ोसी ने डिस्टेंपर किया है, तो हमें ऑइल पेंट करना है।
पड़ोसियों की समृद्धि का वजन करने के लिए घर की औरतों के जिस्म तराजू बन जाते हैं। लक्ष्मी को पूजने वाले गृहलक्ष्मी का क्या इस्तेमाल करते हैं। उत्सव बाढ़ उतर गई है, किनारों पर भांति-भांति का कचरा है, साधनहीन लोगों के टूटे हुए सपने भी बिखरे हैं।