अमृता प्रीतम उन दिनों में अभी अमृत कौर ही थीं। उस व़क्त की अमृत कौर देखने वाली चीज़ थीं। जो भी देखता, होश खो बैठता। मोहन सिंह तो आख़िर कवि थे, गिर गए। कवि-दरबार में उन्होंने अपनी रचना पेश की। पूरा कवि-दरबार लूट लिया। अमृता की कविता भी लोगों में चर्चित रही। वह दिन गया, मोहन सिंह वैरागवान हो गए। मन ऊब गया अमृतसर से और ख़ालसा कॉलेज से। इस तूफ़ानी घटना में वह अपनी सर्विस से इस्तीफ़ा देकर लाहौर शहर में वलिंग्टन रोड पर किराए के मकान में चले गए।
रोटी कहां से आए? परिवार की परवरिश कैसे हो? ख्याल था कि कहीं जाते ही सर्विस मिल जाएगी। मगर कुछ नहीं हुआ। पर मोहन सिंह मस्त थे। इश्क़ की बेहिसाबी, बेपनाह मस्ती में डूबे हुए। वह अमृता के पास थे। उसे जल्दी-जल्दी मिल सकते थे। उससे बातें कर सकते थे। उसकी आंखों में आंखें डालकर बहुत कुछ पूछ सकते थे। उस व़क्त नहीं, बहुत देर बाद हमें पता चला था कि ख़ालसा कॉलेज के कवि-दरबार की समाप्ति के बाद अमृता उनके पास रात ठहरी थीं और उनसे बातें की थीं।
..जिस दिन की मैं बात कर रहा हूं, उस दिन मोहन प्यारे अपने बिस्तर में लेटे हुए थे। सर्दी बहुत थी। मैं भी वहीं पड़ा था कि अचानक आवाज़ आई, ‘आओ, चाय पीते हैं।’ मैं उठा और प्रोफैसर साहिब के नज़दीक ही बैठ गया। चाय का कप आ गया। हम दोनों गर्मा-गर्म चाय पी रहे थे। मैं जो सोच रहा था, वही बात आ गई,‘रात मैं पागल हो गया। हालत अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं। सिर आग की तरह जल रहा था।’ मोहन सिंह ने बताया।
मैं अभी सोया ही था कि मेरे दोस्त के दिमाग़ की चक्री घूम गई थी। कई दिनों से उन्हें लग रहा था कि वह पागल हो रहे हैं। उनका दिमाग़ इश्क़ में फंसा हुआ था। मायूस थे वह। घबराए हुए। न खाने को मन करता था, न काम करने को। अपने शानदार रोÊागार को यह महसूस करके छोड़ आए कि लाहौर में जाते ही काम मिल जाएगा। आख़िर मामूली आदमी नहीं थे, नाम था। वह सोचते थे कि लाहौर पहुंचते ही रोटी और इश्क़ दोनों ही फटाफट मिल जाएंगे।
उन्हें यह भी यक़ीन था कि अमृत उनकी हो चुकी है। उसने उस रात उनसे बातें की थीं। कवि मोहन सिंह मोहित हो गए थे। प्यार से बड़ा भी कोई लालच हो सकता है, और वह भी एक कवि के लिए? वह अमृत से दूर नहीं रह सकते थे। वह जीना चाहते थे। अमृत के प्यार के बिना वह बेजान थे। एक लाश। वह रांझे की तरह जैसे झंग की गलियों में दाख़िल हो गए थे। वह सस्सी के भंबोर शहर का पुन्नू बन गए थे।
उनके पागलपन की बहुत सारी निशानियां मैं देख रहा था। उन्हें ‘अमृत’ शब्द वाली बहुत सारी लाइनें याद हो गई थीं। फिर वह उठे और एक शैल्फ से एक मोटी कापी ले आए। उसे खोलकर मेरे सामने रख दिया। फिर उसमें से कुछेक लाइनें पढ़ते रहे। ‘अमृत.. अमृत.. अमृत..।’ का जाप शुरू हो गया। वह कहकहा लगा कर हंसे। फिर ‘अमृत घी.. अमृत घी..।’ का जाप शुरू। उन्होंने बताया, ‘मैं लाहौर के बाज़ार में जाता हूं।
दुकानों के बोर्ड देखता रहता हूं। जहां कहीं भी अमृत वाला बोर्ड मिल जाए, उसे देखने लग जाता हूं। टिकटिकी लग जाती है। उस बोर्ड को पढ़ता रहता हूं। पुराने अनारकली बाज़ार में एक दुकान है- अमृत कलॉथ हाऊस। मैं वहां गया, तो उस बोर्ड को घंटों देखता रहा।’ फिर उन्होंने शैल्फ से एक घी का डिब्बा निकाला, ‘यह देखों अमृत घी। अमृत घी।’ वह कहकहा लगाकर हंसे। - डा. गुरचरन सिंह(एक लंबे लेख से कुछ अंश)