नई दिल्ली. उन्हें अपने एक रिश्तेदार से मिलने कनॉट प्लेस से प्रीत विहार जाना था। उन्हंे हेल्पलाइन से कोई जानकारी नहीं मिली। पूछने पर विघ्नेश ने बताया कि उन्हें हिन्दी नहीं आती और जानकारी देने वाले को हिन्दी के अलावा कोई और भाषा नहीं आती है।
इसी तरह रोहिणी में रहने वाली शिल्पा ने अपने बुजुर्ग दादा की कानूनी मदद के लिए सीनियर सिटीजन हेल्पलाइन-1091 पर फोन किया। शिल्पा ने बताया कि दादा के पुश्तैनी मकान में किराएदार घर खाली नहीं कर रहा है, जिसके लिए उन्हें कानूनी सलाह चाहिए।
हेल्पलाइन ऑपरेटर ने सिर्फ इसलिए मदद नहीं की कि वहां से पुलिस की मदद ही दिलाई जा सकती है। बाकी लोगों की समस्या के लिए उनके पास कोई समाधान नहीं है। यह आपबीती सिर्फ कुछेक नहीं, बल्कि दिल्ली के ज्यादातर लोगों की है। इस साल मई-जून में दिल्ली के एक स्वयंसेवी संगठन-सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी-ने सरकार द्वारा दी गई तमाम हेल्पलाइन नंबरों पर फोन किया और पाया कि ये खुद ही हेल्पलेस हैं।
इस संस्था का दावा है कि ज्यादातर हेल्पलाइंस लोगों की समस्याओं का सामाधान करने में विफल साबित हुई हैं। संस्था के अध्यक्ष पार्थ जे. शाह ने भास्कर से कहा कि यह रिपोर्ट तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित है।
संस्था चाहती है कि सरकार अपने काम ठीक ढंग से करे। इन चौंकाने वाले तथ्यों से यह भी साबित होता है कि सभी हेल्पलाइनें आम नागरिकों के लिए बेकार ही हैं। इस समस्या पर शोध कर रहीं वेंकटेश्वर कॉलेज की चिश्ता कोचर ने भास्कर को बताया कि जब उन्होंने हेल्पलाइनों पर कॉल करना शुरू किया तो उन्हे मालूम था कि इनसे हेल्प की कम ही गुंजाइश है।
चिश्ता ने बताया कि कुछ हेल्पलाइनों में आप हिंदी के अलावा किसी और भाषा में बात भी नहीं कर सकते हैं। मसलन, दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की सामान खोया-पाया हेल्पलाइन को ही लें। अगर किसी दूसरे राज्य या देश से आया कोई व्यक्ति डीटीसी में अपने लापता सामान की जानकारी लेने के लिए अंग्रेजी में बात करना चाहे, तो मुमकिन है कि ऑपरेटर उसकी बात समझ ही न पाए और फोन पटक दे। चिश्ता बताती हैं कि डीटीसी की हेल्पलाइन में कोई भी आपसे हिंदी के अलावा किसी और भाषा में बात नहीं कर सकता।
पार्थ बताते हैं कि दिल्ली में हेल्पलाइन के नंबर काफी लंबे होते हैं। इसके कारण हर नंबर को याद करना काफी मुश्किल होता है। इस बाबत संस्था ने सरकार को सभी शिकायतों और हेल्प के लिए सिर्फ एक नंबर रखने का सुझाव दिया है जिससे सभी समस्याओं को किसी एक जगह सुना और निबटाया जा सके।
कॉमनवेल्थ के लिए कितनी तैयारी
जानकार कहते हैं कि हेल्पलाइनों के हेल्पलेस होने से कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान समस्या गंभीर हो सकती है। अगले साल गेम्स में हिस्सा लेने और देखने के लिए सैकड़ों लोग विदेशों से आएंगे। ऐसे में हेल्पलाइनों का ढीला रवैया काफी परेशानी में डाल सकता है। कामनवेल्थ गेम्स को ध्यान में रखते हुए दिल्ली की महिला एवं बाल विकास मंत्री किरण वालिया ने भास्कर को बताया कि हेल्पलाइनों की इन गंभीर समस्याओं पर विचार किया जाएगा और इन्हें जल्द से जल्द ठीक करने की पहल की जाएगी। भाषा को लेकर आने वाली समस्याओं के लिए भी सरकार कुछ अहम फैसले लेने पर विचार करेगी।