आज मैं विवेक से मिलने गई। हमारे प्यार को घर वालों की सहमति की मुहर लग चुकी थी। विवेक ने शादी के कार्ड बांटने के लिए एड्रेस डायरी मांगी थी। जल्दी-जल्दी में ले जाना भूल गई। विवेक ने आते ही मुझसे पूछा और उदास हो गया। मैंने कई बार उससे सॉरी कहा पर उसने कहा कुछ नहीं।
पूरे वक्त वो बुझा-बुझा सा रहा। मैं लगातार उसे हंसाने की कोशिश करती रही पर वो अपने ख्यालों में ही गुम था। घर आते-आते मैंने उससे फिर पूछा कि ‘क्या हुआ है?मेरा डायरी भूल जाना इतनी बड़ी बात तो नहीं थी।’ सारा मूड खराब हो गया। मुझे घर छोड़ते वक्त उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।
मेरी आंखें नम हो गईं। लेटे-लेटे सोचती रही और इसी में वक्त का पता ही न चला। ‘कहीं विवेक उस डायरी में से किसी और लड़की का पता तो नहीं चाहता था। कोई खास! मैं भी क्या सोच रही हूं। विवेक ऐसा नहीं है। हम दोनों के रिश्ते में जो प्यार था, वो मर रहा है।
शादी के बाद हमारा रिश्ता कैसे आगे बढ़ेगा? नहीं, मुझे कल सुबह ही विवेक से बात करनी होगी।’घर पहुंचकर विवेक ने अपनी डायरी में लिखा-‘कुछ नहीं बचा। ज़िंदगी ही बेकार है। आज का दिन बहुत खराब था। इंडिया कैसे क्रिकेट मैच हार सकती है? और सचिन, उसे क्या हो गया था..।’