राष्ट्रपति बराक ओबामा इस बात पर फैसला लेने वाले हैं कि अफगानिस्तान में और अधिक सैनिक भेजे जाने चाहिए या नहीं, लेकिन इससे पहले उन्हें इस सच्चई से मुंह नहीं फेरना चाहिए।
सच्चई यह है कि 9/11 की घटना के मास्टरमाइंड तो आठ साल पहले ही अफगानिस्तान से भाग चुके थे। वे अब निश्चित तौर पर पड़ोसी देश पाकिस्तान में रह रहे होंगे।
इसलिए अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो की सेनाएं जो कर रही हैं, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान में अतिवादियों को कैसे पराजित किया जाए।
स्थिति यह है कि जहां अफगानिस्तान में ३क् डॉलर खर्च किए जा रहे हैं, वहीं पाकिस्तान में महज एक डॉलर और इस एक डॉलर का भी बड़ा हिस्सा अन्य कार्यो में स्थानांतरित किया जा रहा है।
अब जबकि पाकिस्तान आतंकवाद को लेकर जाग रहा है, अमेरिका अपना योगदान भी बढ़ा रहा है। पाकिस्तान ने हाल ही में तालिबान और अल-कायदा के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू की है, जिसकी अमेरिका लगातार मांग करता आया है।
अमेरिकी कांग्रेस अमेरिका द्वारा दी जा रही सहायता राशि के प्रति पाकिस्तान से जवाबदेही की मांग करती आई है। वह इस बात का भी हिसाब चाहती है कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में सहायता राशि के कितने हिस्से का इस्तेमाल किया गया।
लेकिन बदलते परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस को यह जवाबदेही पाकिस्तान के बजाय व्हाइट हाउस के कंधों पर डाल देनी चाहिए। आखिर इस सिलसिले में पाकिस्तान का रिकॉर्ड कभी भी पाक-साफ नहीं रहा है।
‘यूएसए टुडे’ अमेरिका का प्रमुख अखबार है।