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Thursday, October 22, 2009 00:51 [IST]  

danik bhaskarडरते हुए काटी रात

सुखदा नामजोशी

Pehla tanha safar बात 1976 की गर्मी की छुट्टियों की है। मेरे पतिदेव के पास छुट्टी न होने के कारण मैं अपनी ममिया ननद को उसके माता-पिता के पास छोड़ने के लिए लिंबडी (गुजरात) गई थी। लिंबडी में झांसी से मेरी मौसेरी ननद सपरिवार द्वारिका जा रहे थे, चूंकि मैंने भी द्वारिकाधीश के दर्शन नहीं किए थे, सो उन लोगों के आग्रह पर मैं भी साथ जाने तैयार हो गई।

हम लोग शाम को वहां से पैंसेजर ट्रेन में बैठे, जो सीधे दूसरे दिन द्वारिका पहुंचाती थी। बाकी रिश्तेदारों के पास प्रथम श्रेणी का पास था और मेरे पास दूसरे दर्जे का टिकट, इस कारण मुझे उनसे अलग लेडीÊा डिबे में बैठना पड़ा। गाड़ी छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती थी, सो गांव के लोग बार-बार चढ़ते-उतरते थे।

इस बीच मेरी आंख लग गई। अचानक गाड़ी में किसी के ठक-ठक करने की आवाज के कारण मैं हड़बड़ाकर उठ गई। वह जामनगर स्टेशन था और रेल्वे पुलिस का एक हवलदार गाड़ी पर डंडा बजा रहा था। अपने चारों ओर देखकर मैं सन्न रह गई। सभी महिला यात्री उतर चुकी थीं और पूरे डिब्बे में मैं अकेली थी।

हवलदार ने सावधान करते हुए मुझसे कहा-‘बहन, पल्ला गले के चारों ओर लपेट लो।’ क्योंकि मैंने सोने का मंगलसूत्र ओर चूड़ियां पहन रखी थीं। इसके बाद की पूरी रात डर के साये में मैंने खुली आंखों से काटी। आज भी मुझे पहला तन्हा सफर याद है।

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