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व्यक्तिगत अभिरुचि का मामला है जायका
एन रघुरामन Friday, October 23, 2009 00:21 [IST]  

हाल ही में एक ई-मेल ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। इसकी शुरुआत होती है, ‘आप एक डिनर टेबल पर बैठे हैं।’ इसके बाद कहानी का रुख डिनर टेबल पर दाएं तरफ बैठे शख्स की ओर मुड़ जाता है जो सूप परोसे जाने पर उसका स्वाद चखे बिना उसमें बेतहाशा नमक व मिर्च-मसाला छिड़कना शुरू कर देता है। इसके बाद कहानी में आपकी संभावित प्रतिक्रिया के बारे में बात होती है- आपको अपने पड़ोसी की पसंद पर बेहद घृणा होने लगती है। पहले-पहल मुझे इस कहानी में कोई दम नजर नहीं आया, तभी मैंने एक खास बात नोटिस की। मुझे दूसरे के उस काम के बारे में घृणा और आलोचना के भाव नजर आए, जिससे मेरा कोई वास्ता ही नहीं है।



कई बार हम दूसरों की पसंद-नापसंद का आकलन करने लगते हैं। हम इस आधार पर व्यक्तियों के अच्छे या खराब होने का आकलन करने लगते हैं कि वे किस तरह की किताबें पढ़ते हैं, किस तरह की फिल्में देखते हैं, अपने बच्चों को किस स्कूल में भेजते हैं, अपने घरेलू नौकरों के साथ किस तरह पेश आते हैं, अपनी कार या वाहनों का किस तरह रखरखाव करते हैं इत्यादि-इत्यादि। जब हम अपने पड़ोसी, मित्र या किसी परिचित का आकलन करते हुए खुद के बारे में बेहतर महसूस करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि हम भी वही गलती कर रहे हैं जो कैपलर और गैलीलियो के समकालीन लोगों ने की थी। उस वक्त लोगों ने इन वैज्ञानिकों को उनकी इस कथनी के लिए दंडित किया कि ब्रांड पृथ्वी के इर्द-गिर्द नहीं घूमता है।



आज हम में से ज्यादातर लोग सहर्ष यह मानते हैं कि ब्रांड हमारे इर्द-गिर्द नहीं घूमता, लेकिन तब हमें काफी परेशानी होती है जब हकीकत की इस अहं-केंद्रित तस्वीर को अपनी ही जिंदगी से विस्थापित करने की बात आती है। हमारी जिंदगी हमारे लिए अहम है, संभवत: सबसे ज्यादा अहम। लेकिन हमारे साथ-साथ किसी और इंसान के लिए भी उसकी अपनी जिंदगी उतनी ही अहम है।



किसी का आकलन करते हुए हम दूसरों के मुकाबले बेहतर या कमतर महसूस करते हैं। हमारा कोई भी निर्णय किसी पुख्ता कसौटी पर आधारित नहीं होता। हम कभी भी (जैसा कि मेरे पास आए ई-मेल में इशारा किया गया) डिनर टेबल पर अपने पड़ोसी के पास जाकर यह पूछने की जहमत नहीं उठाते कि वह इतना ज्यादा नमक और मिर्च-मसाला क्यों खाता है। हम यह इसलिए नहीं पूछते, क्योंकि इस तरह पूछकर हम अपने पड़ोसी का आकलन करने की स्थिति में नहीं रह जाएंगे। उसकी इस नितांत अपरिचित (कम से कम हमारे लिए) खाने की आदतों के बारे में जानकर हो सकता है कि हम उसके प्रति घृणा या आलोचना के भाव पालने की बजाय उसे अच्छा आदमी समझने लगें।



जब नमक, मिर्च, प्याज, लहसुन, करी या अन्य किसी तरह की जायकेदार चीज की बात आती है तो हम इसे एक ही तरीके से देखना चाहते हैं- और वह तरीका है हमारा अपना तरीका। हमारे लिए यह समझना मुश्किल होता है कि कोई इस तरह के भोजन का लुत्फ कैसे उठा सकता है, जो हमारे लिहाज से स्वादिष्ट नहीं है। किसी को अपने खाने में ‘कम’ या ‘ज्यादा’ मसाले डालते देखना हमें अजीब लगता है। लेकिन खाने को किस तरह जायकेदार बनाया जाए, यह प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने स्वाद पर निर्भर करता है।

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