करण जौहर की ‘माय नेम इज खान’ फिल्म में नायक को ऑटिज्म है, जिसमें स्वयं को अभिव्यक्त करने में कठिनाई होती है। यह समझ के लोचे की बीमारी है। संजय लीला भंसाली की नई फिल्म ‘गुजारिश’ में नायक व्हील चेयर पर दिखाया जाएगा। आमिर खान डिसलेक्सिया केंद्रित फिल्म ‘तारे जमीं पर’ बना चुके हैं। आमिर खान थोड़े समय के लिए याददाश्त चले जाने पर ‘गजनी’ फिल्म कर चुके हैं। अलजाइमर्स पर भी ‘ब्लैक’ और ‘यू मी और हम’ फिल्में बन चुकी हैं। आजकल बीमारी पर केंद्रित फिल्मों में यथार्थ प्रस्तुत होता है यानी रोग की पूरी जानकारी पेश की जाती है। एक जमाने में राजेंद्र कुमार, राजकुमार और मीना कुमारी अभिनीत फिल्म ‘दिल एक मंदिर’ में कैंसर रोगी स्वस्थ हो जाता है और इलाज करने वाला डॉक्टर मर जाता है। राजेंद्र कुमार अभिनीत फिल्म ‘अमन’ में आणविक विकिरण के जापानी रोगियों का इलाज भारतीय डॉक्टर करता है। यह एकमात्र फिल्म है, जिसके प्रारंभ में बर्टेड रसेल ने भाग लिया था। इसकी कथा वी शांतारामजी की ‘डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी’ से प्रेरित लगती है। ऋषिकेश मुखर्जी की राजेश खन्ना अभिनीत ‘आनंद’ कैंसर केंद्रित सफलतम फिल्म है। इसमें भयावह बीमारी को रूमानी ढंग से प्रस्तुत किया गया। दर्द में मुस्कराते रहने वाले चार्ली चैप्लिन बीसवीं सदी के दूसरे दशक में ही अमर हो चुके थे। मुखर्जी महोदय ने ‘आनंद’ का स्त्री संस्करण जया बच्चन के साथ ‘मिली’ में प्रस्तुत किया था, परंतु सफलता नहीं मिली। इन दोनों फिल्मों के पहले मुखर्जी महोदय धर्मेद्र के साथ ‘सत्यकाम’ बना चुके थे, जिसमें कैंसर भ्रष्टाचार के रूपक की तरह प्रस्तुत था। हृदय रोग का सिनेमाई इस्तेमाल सीमित है कि पिता की अंतिम इच्छा के कारण नायक/नायिका विवाह कर लें, जैसे हम विगत वर्ष में प्रदर्शित ‘रब ने बना दी जोड़ी’ फिल्म में देख चुके हैं। याददाश्त चले जाने पर अधिकतम फिल्में बनी हैं। एलिया कजान की ‘द अरेंजमेंट’ का नायक कार दुर्घटना के बाद डॉक्टर की याददाश्त जाने की शंका को सुनकर स्मृति जाने का ढोंग शुरू करता है और रिश्तों की हकीकत उजागर होते ही उसके पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाती है। अमेरिका में प्राय: बीमारी केंद्रित फिल्मों को ऑस्कर मिल जाता है। इस श्रेणी की फिल्मों में मराठी भाषा में बनी ‘श्वास’ महान फिल्म है। इसमें ‘आनंद’ वाली रूमानियत नहीं है, मानवता से ओतप्रोत यथार्थ है। बीमारी केंद्रित फिल्मों के प्रति दर्शक का रुझान स्वाभाविक है। अधिकतम दर्शकों ने जीवन में इस दर्द को देखा या सहा है। मुस्कराने से ठहाके लगाने तक हंसी के रूप सीमित हैं, परंतु दर्द की सीमा नहीं होती और व्यक्ति का अपना गठन या मनोविज्ञान ही उसे दर्द सहने का रास्ता भी दिखाता है। कुछ लोग सुई चुभने पर रोते हैं, कुछ हंसते-हंसते जान दे देते हैं। भीतरी गठन ही सुख-दुख को परिभाषित करता है।
अंग्रेजी अखबार ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में मीनाक्षी सिन्हा लिखती हैं कि आजकल फिल्मकार पारंपरिक बीमारी टीबी या कैंसर के बदले उन बीमारियों से पात्रों को ग्रसित बताते हैं, जो बहुत कम लोगों को होती हैं। अमिताभ बच्चन अभिनीत आगामी फिल्म ‘पा’ (पिता के लिए संक्षिप्त संबोधन) में उन्हें प्रोजेरिया का रोग है, अत: उनकी उम्र औसत से पांच गुना तेजी से बढ़ती है। अमेरिकी फिल्म ‘स्ट्रेंज केस ऑफ बर्टन’ में आदमी बूढ़ा पैदा होता है और शनै:शनै: उसकी उम्र घटती है।