चंडीगढ़. संस्कृतिकर्मी प्रवीण शेखर कहते हैं कि दर्शकों के टीवी और सिनेमा से मोहभंग का दौर शुरू हो चुका है। यही वजह है कि दर्शक फिर से रंगमंच से जुड़ रहे हैं। उनका मानना है कि टीवी और सिनेमा की अपनी सीमाएं और संभावनाएं हैं। इनसे आगे ये दोनों ही माध्यम दर्शकों को अपने साथ बांधे नहीं रख सकते।
दरअसल, उपभोक्तावाद और आधुनिकता के इस दौर में उत्पाद से लेकर मानवीय रिश्तों के अर्थ बदल रहे हैं। ऐसे में दर्शक भी पिछले सात दशक से सिनेमा और फिर टीवी की हद से परिचित हो चुकेहैं। प्रवीण शेखर राष्ट्रीय नाट्य उत्सव में नाटक लेकर चंडीगढ़ आए हैं।
हमने जिम्मेदारी नहीं निभाई
रंगमंच और दर्शकों का साथ छूटने के लिए प्रवीण रंगकर्मियों को ही जिम्मेदार मानते हैं। वह कहते हैं कि हमने ही अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। जबकि रंगमंच ही एक ऐसा माध्यम है जहां रंगकर्मी और दर्शक के बीच जीवंत संवाद संभव है। यह इस कदर जीवंत और जादुई है कि सभागार के अंधेरे में भी यह रिश्ता बना रहता है। यह खूबी दूसरे माध्यमों में नहीं है। लेकिन अब दर्शक रंगमंच के साथ फिर से जुड़ रहा है। प्रवीण की राय में रंगमंच के लिए यह प्रतिवाद और वाद के बीच का सांध्यकाल है।
लोग फिर से रंगमंच की परंपरा से जुड़ने लगेंगे। रंगमंच से अपने रिश्ते की शुरुआत को लेकर प्रवीण कहते हैं कि मानवीय रिश्तों के सारे आयाम रंगमंच में दिखे। फिर जब नाटक करने लगा तो महसूस हुआ कि व्यक्तित्व को विस्तार देने या खुद की खोज के लिए इनसान के पास इससे बढ़िया माध्यम कोई नहीं है। छोटे शहरों में रंगमंच की मौजूदा स्थिति को लेकर वह कहते हैं कि आर्थिक चुनौतियां रंगमंच और रंगकर्मी के सामने हमेशा से रही हैं। दुर्भाग्य से थियेटर का अपना अर्थशास्त्र कभी नहीं रहा।
बॉक्स ऑफिस की चिंता नहीं
वे कहते हैं, रंगमंच हमेशा सरकारी या धनाढ्य लोगों के आश्रय में आगे बढ़ा है। फिर भी छोटे शहरों में रंगमंच का बॉक्स ऑफिस न होने से नाटक के हिट या फ्लॉप होने की चिंता नहीं रहती। इस वजह से कलाकार के पास सृजनात्मक और प्रयोगधर्मिता की आजादी भी रहती है।
प्रवीण को पिछले साल भारत सरकार की ओर से आउटस्टैंडिंग थियेटर आर्टिस्ट का नेशनल अवार्ड मिला। वह इस सम्मान को सामाजिक ऋण की तरह मानते हैं। कहते हैं कि ऐसे सम्मान के बाद कलाकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि इस सम्मान के बदले समाज के सरोकारों पर आधारित कुछ करने की चुनौती भी तो बड़ी हो गई है।
बिखरा-बिखरा सा था ‘लल दे’
वीरवार को राष्ट्रीय नाट्य उत्सव के दौरान मीता वशिष्ठ के निर्देशन में ‘लल दे’ का मंचन हुआ। फिल्म और टीवी अदाकारा मीता के नाम से दर्शक टैगोर थियेटर पहुंचे, लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। यह नाटक कश्मीर की सूफी संत या यों कहें कि घाटी में सूफी परंपरा की अगुवा कही जाने वाली ‘लल दे’ के दर्शन पर आधारित था। फिर भी सब बिखरा सा था।
नाटक के शुरू से ही मोनोटोनी यानी एकरसता ने दर्शकों को नाटक से बंधने नहीं दिया। नाटक शुरू होने के 15 मिनट बाद ही दर्शक थियेटर से बाहर निकलने लगे। पीछे के ब्लॉक में बैठे दर्शकों तक कलाकार की आवाज तक नहीं पहुंच रही थी। यह कलाकार की नहीं बल्कि टैगोर की रेनोवेशन करने वालों से रही खामी का नतीजा है, जो हर नाटक में यहां आने वालों को परेशान करता रहेगा।