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ऊपर पान की दुकान, नीचे गोरी का मकान..
जाहिदा हिना Sunday, October 25, 2009 00:17 [IST]  

यह एक दिलचस्प बात है कि त्योहार मुसलमानों के हों या हिंदुओं के पान के बग़ैर मुक़म्मिल नहीं होते। हद तो यह है कि हमारे यहां शादियां भी पान के पत्ते के बग़ैर नहीं होतीं। दूल्हा-दुल्हन को एक-दूसरे के सामने बिठाकर जब रस्में की जाती हैं, तो पान इन सबमें सबसे जरूरी चीज़ होती है।

दूल्हा और दुल्हन दोनों की हथेलियों पर पान का पत्ता रखकर उस पर मेहंदी, मिश्री उबटन और शगुन की दूसरी चीजें रखी जाती हैं और वे लोग, जो पान खाने के शौक़ीन हैं उन्हें अगर एक व़क्त पान न मिले, तो वो यूं बौखलाए हुए फिरते हैं, जैसे ज़िंदगी की सबसे क़ीमती चीज़ ग़ुम हो गई हो।

यहां पान खाने की आदत बंटवारे के व़क्त कराची और लाहौर आने वाले अपने साथ लाए। पाकिस्तान में पान की तिजारत ताजिरों ने शुरू की और अब यह हाल है कि अक्सर बलूच, सिंधी, मकरानी हिंदुस्तान से आने वालों से कहीं ज्‍यादा शौक़ और ज़ौक से पान खाने लगे हैं। लेकिन उनके घरों में पानदान रखने का रिवाज नहीं है। ये लोग ज्‍यादातर बाज़ार से पान ख़रीदते हैं। और अब तो यह शौक़ पख्तून और पंजाबी बिरादरियों में भी आम है।

कराची और लाहौर में तो अब पान की बाज़ दुकानें 24 घंटे खुली रहती हैं। एक अंदाजे के मुताबिक़ कराची में पान की दुकानों की तादाद तक़रीबन 8 हजार तक पहुंच गई है और उसी लिहाज़ से पान के ख़रीदारों की तादाद में भी इज़ाफ़ा होता चला जा रहा है। लियारी में एक पान शॉप के मालिक फ़हीम अहमद ग्रेजुएट हैं। मुलाजिमत के लिए धक्के खाने के बाद बेरोजागारी से तंग आकर 15 बरस पहले उन्होंने पान की दुकान खोली। अब उनके हालात काफ़ी बेहतर है। वे रोज़ाना 25 सौ से 3000 रुपए तक के पान बेच लेते हैं।

अब तो फाइवस्टार होटलों में भी पान की बड़ी शानदार दुकानें खुल गई हैं। खाना खाकर होटल की लॉबी से गुजरते हुए लोग सौ या डेढ़ सौ रुपए ख़र्च करके पान खाते हैं और कुछ ऐसे शौक़ीन भी हैं, जो दर्जन भर बीड़े बनवाकर साथ भी ले जाते हैं।

वे लोग, जिनके यहां दौलत की रेलमपेल है, वे शादी की महफ़िल का रंग दोगुना करने के लिए किसी मशहूर पान वाले को बुलाते हैं और अब यह मेहमान पर है कि वे किस क़िस्म का पान खाना पसंद करते हैं। मुझे याद नहीं कि यह किस फिल्म का गाना था कि -‘ऊपर पान की दुकान, नीचे गोरी का मकान’। लेकिन यह गीत हमारे यहां बहुत हिट हुआ था और अक्सर पान वालों के खोकों पर बजता हुआ सुनाई देता था। हालांकि यह बहुत पुरानी बात है।









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