पंजाबी में एक मुहावरा है- ‘जीहने लाहौर नई वेखेया, उह जम्मेया ही नहीं।’ इस मुहावरे में बहुत कुछ समाया हुआ है। लाहौर कलाकारों का मक्का रहा है। साहित्यकारों का, चिंतकों का, एक्टरों का, फ़िल्मकारों का, सबका प्यारा लाहौर। बुज़ुर्ग साहित्यकारों से वहां के अनेकों क़िस्से सुनते आ रहे हैं।
पाकि-टी हाऊस से लेकर अनारकली बाज़ार तक के क़िस्से। हमारे साहित्य अकादमी अवॉर्ड प्राप्त शायर डॉ. जगतार तो अपनी ज़िंदगी का अहम हिस्सा लाहौर को ही मानते हैं। उनके बचपन से जुड़ी यादें अब भी सुनें, तो आंखें नम हो आती हैं। इसी तरह पिछले दिनों हमसे भौतिक रूप में जुदा हो गए प्रो. जतिन्द्र पाल सिंह जौली ने भी पाकिस्तानी साहित्य पर बहुत काम किया था।
पिछले महीनों वरिष्ठ कहानीकार प्रेम प्रकाश लाहौर गए थे। वहां से बहुत सारी मीठी यादें लेकर आए और नई-नई बातें भी। उन्हें सबसे बढ़िया लाहौर का ट्रैफिक सिस्टम लगा। वह बता रहे थे कि पूरे लाहौर में सड़कों पर कहीं भी आप ट्रैफिक का उल्लंघन नहीं देखेंगे।
किसी भी दुकानदार ने हमारी तरह न तो सामान सड़कों पर रखा हुआ है और न ही दुकानें आगे की तरफ़ बढ़ाई हैं। वह बता रहे थे कि यह सब देखकर मुझे अच्छा तो लगा, लेकिन वहां जो एक ख़ास तरह का भय लोगों के मनों में था, उदास कर देने वाला था। फिर वह लोकतंत्र को लेकर और डिक्टेटरशिप को लेकर बहुत सारी बातें करते रहे। उनकी बातों से लग रहा था कि लाहौर में नियमों के पालन का मतलब कुछ और ही है।
इसी तरह हमारे कहानीकार मक्खन मान लाहौर देखकर आए, तो उन्हें पूरा लाहौर ही हमारी प्राचीन सभ्यता का नमूना लग रहा था। वह बार-बार वहां की पुरानी इमारतों की बनावट और उन पर की गई कलाकारी की बातें कर रहे थे। बता रहे थे कि किस तरह अभी भी उन इमारतों में पुराना पंजाब बोल रहा है।
अनारकली बाज़ार में कुछेक बड़ी-बड़ी इमारतों के मुख्य द्वार पर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियां अभी भी बनी हुई हैं। ये मूर्तियां तब के लाहौर की तस्वीर को ज़िंदा रखे हुए हैं, जब पंजाब का बंटवारा नहीं हुआ था। ऐसी इमारत कला हमारे इधर अमृतसर में कहीं-कहीं देखी जा सकती है। लाहौर की इस इमारत कला पर बहुत सारा पेंटिंग का काम भी हुआ है। एक पेंटिंग में आर्टिस्ट ने लाहौर के ढाबों को बहुत ही अद्भुत तरीक़े से चित्रित किया है।
लाहौर हमारे बहुत नज़दीक है। सभ्याचारक तौर पर भी, भाषा के तौर पर भी, कला के तौर पर भी, इमारतसाज़ी के तौर पर भी और लोगों के स्वभाव के तौर पर भी। क्योंकि बंटवारे के बाद लाहौर में जाकर बसने वाले ज्यादातर पंजाबी दोआबा क्षेत्र से हैं, इसलिए वहां पंजाबी की दोआबी उप भाषा का ख़ूब इस्तेमाल होता है। आपको लगता है जैसे आप जालंधर के किसी गांव या क़स्बे में घूम रहे हों। इस सांझ को हम कैसे मिटा सकते हैं।-बिंदर बसरा